अनुभव सिंहा की नयी फ़िल्म ‘थप्पड़’ पर कुछ बातें…

अनुभव सिंहा की नयी फ़िल्म ‘थप्पड़’ पर कुछ बातें…

‘थप्पड़’ देख आया। निश्चित तौर पर यह एक बेहद ज़रूरी विषय पर बनी फ़िल्म है। आमतौर पर घरेलू हिंसा का जो स्वरूप समाज की चेतना का हिस्सा है, उसके कारण पुरुष वर्चस्व की ऐसी अनेक आपत्तिजनक गतिविधियों पर बात नहीं होती है, जिनपर न केवल बात होनी चाहिए, बल्कि जिनका सशक्त प्रतिरोध होना चाहिए। इस फ़िल्म की ख़ासियत है कि यह  घरेलू स्तर पर स्त्री-पुरुष के बीच व्याप्त, ग़ैरबराबरी के अनेक महीन मुद्दों को बारीकी से दिखाती चलती है। 
भावनात्मक तथा शारीरिक घरेलू हिंसा की शिकार विविध वर्गों की स्त्रियों का चित्रण दर्शक का ध्यान खींचता है। तापसी अभिनीत मुख्य चरित्र के साथ-साथ, उसकी नौकरानी का चरित्र भी फ़िल्म में काफ़ी अहम है, जो लगभग रोज़ अपने पति से पिटती है और जिसके लिए रोज़ पिटना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन आख़िर में वह भी प्रतिरोध करती है। स्त्रियों के पक्ष में केस लड़ रही वकील, जो एक उच्च वर्गीय घर की बहू रहती है, वह भी अपने पति के द्वारा निरन्तर भावनात्मक हिंसा का शिकार होती है। आख़िर में वह भी उस घुटन से आज़ाद होती है। ये घटनाएँ बताती हैं कि एक स्त्री जब प्रतिरोध की शुरुआत करती है, बराबरी और आत्मसम्मान के लिए संघर्ष करती है, तो उसका असर उसके इर्द- गिर्द की अन्य स्त्रियों पर भी पड़ता है। इसलिए घर के भीतर शुरू किये गये ऐसे संघर्षों का महत्त्व केवल व्यक्तिगत आज़ादी तक नहीं है, बल्कि पुरुष वर्चस्व और उससे पैदा हुए अन्यायों के विरुद्ध जब एक स्त्री संघर्ष करती है तो उसका व्यापक सामाजिक महत्त्व है। 
हमारे समाज में स्त्रियों को आत्मसम्मानविहीन करने, उनकी चेतना को कुंद करने और एक पुरुष को उजड्ड तथा अहमन्य बनाने की कवायद कैसे पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है, उस ओर भी यह फ़िल्म  इशारा करती है। ऐसा लगता है कि जैसे समाज की पूरी मशीनरी स्त्री-पुरुष के बीच के इस हायरार्की को क़ायम रखना अपना प्राथमिक दायित्व समझती है। यही कारण है कि हमारे समाज में स्त्रियाँ पति द्वारा किये जाने वाले अपमान और हिंसा को अनेक बार हँसते हुए सह लेती हैं। यह फ़िल्म इस कंडीशनिंग को तोड़ने में अहम भूमिका निभा सकती है। 
इस फ़िल्म में सिनेमा के क्राफ़्ट के लिहाज से कुछ खामियाँ भले होंगी, लेकिन अपने कथानक और डायलॉग से यह दर्शकों की चेतना पर गहरा असर डालने में कामयाब होती है। ऐसे तो लगभग सभी कलाकारों का अभिनय ठीक है, लेकिन ख़ासकर तापसी का और कुमुद मिश्र का अभिनय काफ़ी प्रभावी है।
इस फ़िल्म का असर तब शायद और ज्यादा होता जब इसे इतना अभिजात्य वातावरण में न फिल्माकर, अपेक्षाकृत कस्बाई या ग्रामीण वातावरण में फिल्माया जाता और उस पृष्ठभूमि में कहानी रची जाती। बावजूद इसके यह फ़िल्म लगभग हर वर्ग के दर्शकों की चेतना पर गहरा असर करने में सक्षम है।
बेहद कम समय में ‘आर्टिकल 15’ के बाद, ‘थप्पड़’ के रूप में एक और सशक्त फ़िल्म का निर्माण कर प्रस्तुत करने के लिए अनुभव सिंहा और उनकी पूरी टीम बधाई की पात्र है।

सुशील कुमार सुमन पेशे से सहायक प्राध्यापक हैं। कोचबिहार पंचानन बर्मा विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल में हिंदी साहित्य पढ़ाते हैं। सुशील हिंदी साहित्य के युवा पीढी से आते हैं।

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