गीत चतुर्वेदी से गायत्री की बातचीत

गायत्री : आपके बारे में रिसर्च करते वक़्त मालूम हुआ कि कई जगहों पर आपके नाम के साथ एक फ्रेंच शब्द ‘अंवा-गार्द’ (AVANT-GARDE) जोड़ दिया जाता है। एक कवि और लेखक के रूप में आप अपने आप को इसके कितने क़रीब पाते हैं?

गीत : अंवा-गार्द एक फ्रेंच शब्द है, जो आमतौर पर पुराने ज़माने में सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने वाले सिपाही या सेनापति के लिए इस्तेमाल किया जाता था। बाद में कला की दुनिया में उन लोगों को परिभाषित करने में प्रयुक्त होता था, जो नवीन प्रयोग करते थे, कलात्मक प्रयोगधर्मिता की अग्र पंक्ति में खड़े होते थे, रूढ़िवादी नहीं थे। जहाँ तक मेरी बात है, कई बार मालूम भी नहीं चलता या देर से पता चलता है कि आपके बारे में ऐसा कोई शब्द या विशेषण- जैसा कुछ प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे शब्द या उपाधि या विशेषण पढ़ने-सुनने में कई बार अच्छे लगते हैं, बाज़ दफ़ा अच्छा भी महसूस होता है, लेकिन समग्रता में मैं इन सब से प्रभावित नहीं हो पाता। मैं अपने काम को अधिक देखता हूँ, नाम और उपाधियों को कम।

गायत्री: शॉर्ट स्टोरीज़ लिखना, कहानी व उपन्यास लिखने से किस प्रकार भिन्न होता है?

गीत :  शार्ट स्टोरी को हिंदी में कहानी कहते है। कई बार गलत अनुवाद के कारण उसे ‘लघुकथा’ कह दिया जाता है, असल में वह गलत प्रयोग है।

मैंने जो लिखा, वह लॉन्गर शार्ट स्टोरी थी, जिसे अंग्रेज़ी में नॉवेला कहते हैं, जो नॉवल से कम होता है, जिसे हिंदी में लम्बी कहानी कहते हैं। नॉवेल अपने आप में एक विशाल दुनिया है। बहुत सारे कमरे हैं, बहुत सारी थीम्स, प्लॉट्स पर एक साथ काम चल रहा होता है। उसमें उपकथाएं हो सकती हैं।  वह एक तरह से ज़िंदगी का ऑर्केस्ट्रा है, जिसमें कई सारे साज़ बज रहे होते हैं, कई ध्वनियाँ एक साथ निकलती हैं और उनके बीच एक माधुर्य, एक हार्मनी भी बनाए रखनी होती है।

शार्ट स्टोरी, जीवन के बहुत सारे पहलुओं को छूने के बजाए किन्हीं एक या दो पहलुओं को छूती हैं अर्थात जीवन की विशालता में जाने की बजाए घटनाओं की सूक्ष्मता को दर्शाते हुए जीवन की विशालता से परिचय कराती है। उपन्यास आकार में विशालता की ओर जाते हैं, जबकि कहानियां आकार में छोटी होती हैं, वे घटनाओं, परिस्थितियों, मनुष्य के व्यवहार व स्वभाव की सूक्ष्मता को दर्शाते हुए जीवन की विशालता को दर्शाती हैं। सूक्ष्मता को पकड़ना कहानी विधा की कला है। ओ. हेनरी, अंतोन चेखोव इत्यादि ने कहानी का विस्तार किया, प्रयोग किया, लेकिन 20वीं सदी के मध्य तक आते-आते वैश्विक स्तर पर कहानी विधा पीछे चली गयी। उपन्यास पूरी तरह से मुख्य पटल पर आ गया, एक तरह से साहित्य की केंद्रीय इकाई बन गया उपन्यास। इन दोनों में कई अंतर थे जैसे– परिस्थितियों को देखने, छूने, दृष्टि व क्षितिज का विस्तार इत्यादि के संबंध में। उपन्यास लिखने में ज़्यादा मेहनत, समय और साधना लगती है।

गायत्री : इतनी सारी डिटेल्स को ध्यान में रख पाना साहित्य के विद्यार्थी के लिए भी कठिन होता है, ऐसे में आम जनता के लिए यह सब ध्यान में रखना लगभग नामुमकिन ही होगा और कई बार वे इतना सब कुछ जानना भी नहीं चाहते। फिर साहित्य तो केवल बौद्धिक वर्ग तक सीमित रह जाएगा, सब तक उसकी पहुँच नहीं हो पाएगी!

गीत : अगर हम चना दाल और अरहर दाल के अंतर को समझ सकते हैं, तो कहानी और उपन्यास के अंतर को भी समझ सकते हैं। इसके लिए बहुत अधिक बौद्धिकता की आवश्यकता नहीं होती। अगर शास्त्रीय संगीत में दिलचस्पी है, तो रागों में अंतर और सुर की पहचान होना ज़रूरी है, उसी तरह अगर किसी को साहित्य में दिलचस्पी है, तो उसे डिटेल्स की पहचान होना भी ज़रूरी है।

साहित्य के साथ आमतौर पर यह गफ़लत है कि किसी भी किताब को साहित्य मान लिया जाता है। दरअसल ऐसा नहीं होता है। साहित्य पढ़ने और समझने के लिए आपको साहित्य का विद्यार्थी होना चाहिए। साहित्य को समझने के लिए आपके पास साहित्य पढ़ने की एक बेसिक ट्रेनिंग होनी चाहिए। साहित्य का पाठक नौसिखिया पाठक नहीं होता बल्कि एक अनुभवी पाठक होता है। और वह साधारण पाठकों से ज़्यादा समझदार होता है। हर पाठक एक जैसा नहीं होता। अगर पाठक के पास अच्छे साहित्य को पढ़ने का अनुभव और प्रयास नहीं होगा, तो वह पल्प या पॉपुलर क़िस्म की किताब के साथ ही जुड़ा रहेगा। साहित्य और पल्प में यही सबसे बड़ा अंतर है कि साहित्य पढ़ने के लिए आपको एक खास किस्म की जानकारी, अनुभव और संवेदना चाहिए होती है। अन्यथा आप साहित्य का आनंद नहीं ले पाएँगे।

गायत्री: अगर समकालीन समय को देखें, तो जो भी साहित्य के नाम पर छप रहा है, और जिस वर्ग को वह लुभा रहा है, वे सब साहित्य के पाठक नहीं, बल्कि पल्प के पाठक हैं?

गीत : हर समय में हर तरह की किताबें छपती हैं। साहित्य भी अलग-अलग तरह का, अलग-अलग लेवल का होता है। आज भी ऐसा है। हर तरह की किताबें हैं, लेकिन सबकुछ को साहित्य नहीं कह सकते।

दरअसल, एक बुनियादी युक्ति होती है। अधिकांश लोग एकदम शुरू से ही साहित्य नहीं पढ़ने लगते। उनका क्रमिक विकास होता है। पहले वे लोकप्रिय किस्म की किताबें, पत्रिकाएँ, लोकप्रिय शायरी पढ़ते हैं। उनमें से कुछ का विकास होता है और वे गंभीर साहित्य की ओर बढ़ जाते हैं। रुचियों का विकास और पाठक का क्रमिक विकास आपस में जुड़े हुए हैं।

आजकल सभी के हाथ में स्मार्ट फोन है। उनके दिमाग़ में कुछ भी आया, वे उसे नोट करते हैं और सोशल मीडिया पर डाल देते हैं। वे उसे भी कविता या साहित्य का नाम देना चाहते हैं, लेकिन वैसा होता नहीं है। छपने वाली हर किताब, हर रचना साहित्य का हिस्सा नहीं होती। हर तरह की कविता साहित्यिक कविता नहीं होती। वह मंचीय हो सकती है, सोशल मीडिया टाइप कविता हो सकती है, लेकिन साहित्यिक नहीं हो पाती। साहित्य का हिस्सा बनने के लिए ख़ास किस्म की कलात्मकता, गम्भीरता और गहराई होना अनिवार्य है। जैसे- जीवन में हर चीज़ की एक कैटेगरी होती जा रही है, वैसे ही कलाओं में भी कैटेगरी बनती जा रही है।

गायत्री : प्रेमचंद ने ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के अभिभाषण के दौरान कहा था- ‘जब भाषा का विस्तार हो रहा था, तब बैताल पचीसी जैसी रचनाओं की आवश्यकता थी, लेकिन अब भाषा तैयार हो चुकी है। तार्किक रचनाएं आज की आवश्यता हैं। यह प्रेमचन्द ने 1930 में कहा था। उस समय से अबतक भाषा व विषयवस्तु इत्यादि मानकों के आधार पर क्या यह कहना उचित होगा कि वर्तमान दौर साहित्यिक पतन का दौर है ?

गीत : नहीं, मेरा दृष्टिकोण अलग है। मैं नहीं मानता कि पतन हुआ है, बल्कि हिंदी का विकास हुआ है। प्रेमचन्द हमारे बड़े लेखक हैं। निर्मल वर्मा, अज्ञेय, निराला इत्यादि सब प्रेमचन्द के बाद के हैं, और ये भी हमारे बड़े लेखक हैं। आप कह रही हैं कि पतन का दौर है। अगर पतन होता, तो प्रेमचंद के बाद सब ख़राब लेखक आते, पर बाद का साहित्य और बेहतर होता गया, भाषा, शैली, कथ्य आदि के स्तर पर। यही यह भाषा व साहित्य का विकास है। आज भी बहुत सारे बेहतरीन लेखक हैं।

एक बात जो ध्यान देने वाली है, वह यह है कि कैटेगराइज़ेशन ज़्यादा हो गया है। बहुत सारी श्रेणियां बन गयी हैं। 1930 के दौर के सबसे बड़े प्रतीक प्रेमचन्द हैं, तो 2020 के सबसे बड़े प्रतीक को उठाकर तुलना करनी चाहिए। अगर ऐसा करेंगे, तो हमें विकास ही दिखेगा। 2020 में विनोद कुमार शुक्ल भी तो लिख रहे हैं न, फिर पतन कैसे हुआ? विनोद जी हिंदी साहित्य का गौरव हैं और आधुनिक हिंदी के महानतम लेखकों में से एक कहलाएँगे।

आमतौर पर निंदक-बुद्धि वाले क्या करते हैं? वे 1930 के सबसे बड़े प्रतीक प्रेमचंद के सामने 2020 के सोशल मीडिया टाइप लेखक की रचना रख देते हैं, जिसकी भाषा भी अशुद्ध होती है और उसके बाद, इस बेमेल तुलना के आधार पर फ़ैसला देते हैं कि देखो-देखो, पतन हो रहा है। देखिए, ख़राब साहित्य हर दौर में लिखा जाता है। प्रेमचंद के दौर में भी लिखा गया है और आज भी लिखा जा रहा है। हर युग में कुछ अच्छे लेखक होते हैं और बहुत सारे औसत लेखक होते हैं। औसत लेखकों को आधार बनाकर हम युग की परिभाषा नहीं गढ़ सकते। हमें अच्छाइयों की तुलना करनी चाहिए।

गायत्री: आमतौर पर गद्य रचनाएं पाठकों का ज़्यादा ध्यान खींचती हैं। गद्य लेखक ज़्यादा प्रसिद्धि पाते हैं। बेस्टसेलर कैटेगरीज़ इत्यादि में भी गद्य का बोलबाला है यानि बाजार के हिसाब से भी गद्य की किताबें ही ज़्यादा बिकती हैं। इसपर एक कवि के रूप में आप क्या कहना चाहेंगे?

गीत : यह भी महज़ एक दृष्टिकोण है, जो चीज़ों के हिसाब से बदल सकता है। इन चीजों को दो तरह से देख सकते हैं : पहला, बाजार के हिसाब से।

यह बिल्कुल ठीक बात है कि पुस्तक मेलों में या दुकानों पर गद्य की पुस्तकें, ख़ासकर उपन्यास ज़्यादा बिकते हैं। यह सिर्फ भारत या हिंदी की हालत नहीं है। दुनिया की हर भाषा में उपन्यास ज़्यादा बिकती हैं। इसके पीछे एक कारण है। असलियत में, उपन्यास लंबे समय तक पाठक के साथ टिके रहते हैं ज़्यादातर उपन्यास पढ़ने के लिए पाठक को किसी खास बौद्धिक श्रम की आवश्यकता नहीं होती। वह उसे पढ़ता है और पढ़ने के दौरान जितना समझ सकता है समझता है और सबसे महत्वपूर्ण है कि कथारस के कारण बंधा रहता है। कविताओं के साथ ऐसा नहीं है। कविताएँ पढ़ने के लिए आपको एक अलग किस्म की मानसिक तैयारी और प्रेरणा चाहिए होती है और कविताएँ सबके बस की बात नहीं होतीं। यही कुछ कारण हैं कि कविता की किताबें कम बिकती हैं।

दूसरी बात, बीसवीं सदी में उपन्यास, साहित्य की मुख्य विधा के रूप में प्रसिद्ध हुआ है। लेकिन इसके बाद भी, पता नहीं क्यों, कवियों में कुछ ऐसा है कि अपने युग का निर्धारण हमेशा कवियों द्वारा होता है। हिंदी पत्रिका ‘हंस’ के हर दूसरे-तीसरे अंक में आपत्ति जाहिर की जाती थी कि हिंदी में स्टारडम कवियों को क्यों मिलता है। कविता बिकती कम है, उसके पाठक कम हैं, इसके बावजूद साहित्य के केंद्र में कवि और कविता खड़े होते हैं। ये कुछ अलग किस्म का आभामण्डल है, कुछ अलग किस्म की बौद्धिक अपील है, कुछ अलग किस्म की अनुभूति कवियों और कविताओं के आसपास से निकलता है, जो बुद्धविजियों के सबसे ऊंचे दर्जे को आकर्षित करती है। कई बार ऐसा होता है कि आपका विस्तार कम होता है, लेकिन प्रभाव ज़्यादा होता है। कविता अपना प्रभाव पैदा करने में सक्षम है। इसलिए दुनिया की किसी भी भाषा के केंद्र में प्रायः कवि खड़ा होता है। ज्ञानपीठ पुरस्कार, नोबल पुरस्कार, अकादमी पुरस्कार ज्यादतर कवियों को मिले। एक जनरल ऑब्जर्वेशन देखें, तो कवि उस बौद्धिकता को प्रभावित करने में और उस नएपन को पाने में आमतौर पर आगे रहता है।

गायत्री: बात पुरस्कारों की हो ही रही है तो जब कविता और उपन्यास, कहानी आदि अलग विधाएं हैं जिनमें कविताओं के लिए खास किस्म की बौद्धिक तैयारी, मानसिक श्रम और कवि का एफ़र्ट लगता है। ऐसे में उन विधाओं की तुलना करना जिनकी प्रकृति, श्रम और एफ़र्ट एक दूसरे से भिन्न है, उनको एक ही श्रेणी में रखना और पुरस्कारों के लिए चयन करना काफी मुश्किल होता है, क्यों न ऐसा हो कि अलग अलग विधाओं के लिए ये बड़े सम्मान की अलग अलग श्रेणियां बना दें।

गीत : इस बारे में मैं क्या कहूँ, क्योंकि यह उन संस्थाओं की सुविधा के अनुसार है। अब साहित्य में तमाम अलग-अलग विधाएं हैं। हालांकि ये बड़े पुरस्कार अमूमन लाइफ टाइम अचीवमेंट की तरह होते हैं। एक रचनाकार कवि हो या कहानीकार, उसने जीवन में किस तरह की रचनात्मक उपलब्धियाँ पायी हैं और उसने साहित्यिक परम्परा व समाज के साम्वेदनिक विकास में कितना योगदान किया है, ऐसी तमाम कसौटियां हैं। यह तो निर्णायकों का सिरदर्द है और एक बेहतर सिरदर्द है। साहित्य में कोई अकेला सर्वश्रेष्ठ नहीं होता, बल्कि हर समय श्रेष्ठताओं का एक पुंज होता है। एक साथ कई लोग श्रेष्ठ होते हैं।

लेकिन ये बढ़िया सुझाव है। हर श्रेणी के लिए अलग पुरस्कार होना चाहिए। लोगों को इस तरफ़ सोचना चाहिए। कई बार एक ही युग में, दो अलग अलग विधाओं में काम करने वाले दो सर्वश्रेष्ठ रचनाकार ज़िंदा रहते हैं, क्योंकि वे दो अलग अलग विधाओं में हैं, ऐसे में उनके बीच तुलना करके किसी एक को पुरस्कृत कर देना दूसरे के साथ रचनात्मक अन्याय भी होता है। लेकिन फिर जीवन ऐसा ही है।

गायत्री: आपको ‘न्यूनतम मैं’ के लिए स्पंदन कृति सम्मान मिला है। यह एक कविता संग्रह है। कविता संग्रह को तैयार करने की यात्रा किस तरह की होती हैं और आपको इसकी प्रेरणा कहाँ से मिली, इस बारे में कुछ बताइए।

गीत : किसी एक किताब के बारे में अलग से बोलना मुश्किल होता है। ‘न्यूनतम मैं’ सन 2017 में आई। इसमें 2010 से 2014 तक की कविताएँ शामिल हैं। 2017 में आने के बाद भी, वो अपने से पहले की एक किताब के साथ संवाद स्थापित करती हैं । मेरी पहली किताब 2010 में आयी थी। उसके बाद यह दूसरी किताब 2017 में आयी। कई बार पहली किताब आपको एक रचनात्मक सुख तो देती है परन्तु एक श्राप भी देती है; श्राप यह होता है कि दूसरी किताब आने में वक़्त लगेगा।

इस संग्रह के लिए कविताएँ रखने में मैंने  2010 वाली प्रकृति से काफ़ी बदलाव किए। कविताओं के व्याकरण, दृष्टि इत्यादि में काफी कुछ बदलाव किया, जिसमें समय लगा। असल में संग्रह तैयार करने के दौरान कविताओं का परिवार, पंक्ति की मित्रताएं, शत्रुताएं, सामंजस्य इत्यादि देखना पड़ता है, जिसमें समय लगता है। इसमें कुल 63 कविताएँ चुनकर एक साथ रखीं। पहली और दूसरी किताब के गीत चतुर्वेदी में बहुत अंतर है। एक कवि और पाठक, दोनों तरीक़ों से। कविता को लेकर मेरी सोच, मेरी माँग, दृष्टि और चिंतन इन सभी में बदलाव आया। और प्रसन्नता की बात यह है कि इस बदलाव को हिंदी पाठक समाज ने भी रेखांकित किया और इसे हाथोंहाथ लिया।

गायत्री : जैसा कि आपने भी कहा, उपन्यास अथवा गद्य की विधाओं से जुड़ना प्रायः आसान होता है, इसलिए उनको लेकर प्रकाशक के पास आसानी से जाया जा सकता है। इससे इतर कविताएं क्योंकि समझने में समय लेती हैं व कठिन होती हैं। ऐसे में कविता संग्रह छपवाना कितना मुश्किल होता है?

गीत : अगर आप अच्छे कवि हैं, तो आपके लिए छपना बिल्कुल मुश्किल नहीं है। मैं अपना अनुभव बताता हूँ। मेरा पहला संग्रह 2010 में राजकमल प्रकाशन से छपा। इसकी एक पृष्ठभूमि है। 2004 में दिल्ली में एक प्रोग्राम था जहाँ मैं एक श्रोता की तरह गया था। तब बहुत कम लोगों से मेरा परिचय था। लेकिन मेरी कविताएँ लम्बे समय तक पत्रिकाओं में छपती रही थीं और कई वरिष्ठ कवि मेरी कविताओं के कारण मुझ पर स्नेह भी बरसाते थे। उस कार्यक्रम में राजकमल के मालिक श्री अशोक माहेश्वरी मेरे पास आए और उन्होंने पूछा, क्या आप गीत चतुर्वेदी हैं। और उसके बाद उन्होंने मुझे प्रस्ताव दिया कि आपकी किताब हम छापेंगे। मैंने कहा, लेकिन मैं अभी खुद ही अपनी कविताओं से संतुष्ट नहीं हूँ। उन्होंने कहा, जब भी संतुष्ट होइएगा, हमें सूचित करिएगा। हम ही छापेंगे, आप की किताब। अपनी कविताओं से संतुष्ट होने और उनकी पांडुलिपि को फाइनल करने में मुझे पाँच साल लग गए। तब 2010 में पहला कविता संग्रह “आलाप में गिरह” छपवाया।

तो एक स्थिति ऐसी भी है कि आपके पास प्रकाशक खुद चलकर आता है, ज़रूरत है, आपको अपनी रचनात्मकता को बेहतर करने की। मैं नौजवान रचनाकारों से यही कहता हूँ कि आप एक्सीलेंस के ऊपरी लेवल पर पहुँच जाएँ, उसके लिए अध्ययन, अध्यवसाय और अभ्यास करें। उस लेवल को छूने के बाद चीज़ें ख़ुद-ब-ख़ुद आपके पास आ सकती हैं।

दूसरी बात, कई बार ऐसा नहीं भी होता है। तब आप बैठे-बैठे इंतज़ार भी तो नहीं कर सकते न! लेकिन तब भी, निराश नही होना चाहिए। अपनी रचनात्मकता की उत्कृष्टता बनाए रखते हुए अतिरिक्त प्रयास करके अच्छे प्रकाशकों के पास जाना चाहिए। उसमें भी कोई संकोच या कमतरी नहीं महसूस करनी चाहिए। ये सब अवसर और संयोग की बातें हैं, जीवन की स्थितियाँ हैं, सबके साथ एक जैसी नहीं होतीं, लेकिन प्रयास करने में कभी शर्म या संकोच नहीं करना चाहिए।

गायत्री: अभी सोशल मीडिया पर आप क्लासिक लेखकों जैसे काफ़्का, कामू, नेरूदा इत्यादि पर सीरीज़ चला रहे हैं। अगर क्लासिक साहित्य की बात करें, उस दौरान की अधिकतर कृतियाँ प्रोटेस्ट या किसी शोषणात्मक रवैये के विरोध में उपजी थी। आज का दौर भी सामान्य नहीं है, शोषण व शोषण के ख़िलाफ़ संघर्ष ज़ारी हैं। ऐसे में रचनाकारों से एक पाठक क्या उम्मीद करे? साथ ही इस समय में लेखक की भूमिका क्या है?

गीत : ज़रूरी  नहीं है कि दुनिया की सारी महान कृतियाँ प्रोटेस्ट से उपजी हों। वे अपने समय के साथ प्रतिक्रियात्मक सहयोग व संवाद से भी उपजती हैं। हर जगह, हर साहित्य के मूल में प्रोटेस्ट खोजना, विरोध खोजना एक ग़ैर-ज़रूरी रूमानी सोच है। मुख्य बात विरोध नहीं है, बल्कि संवाद है। क्लासिक के मूल में क्या होता है? मनुष्य की चेतना, चरित्र, गुणों और समय के साथ संवाद। दॉस्तोएव्स्की अपने समय के साथ संवाद स्थापित करते हुए क्राइम व पनिशमेंट लिखते हैं।  आज के समय में जो लेखन हो रहा है, वह आज के साथ डायलॉग करके ही हो रहा है। कोई भी रचना बड़ी नहीं बन पाती जब तक वह अपने समय व अपने ‘वृहद समय’ (युग) के साथ संवाद स्थापित नहीं कर सके। बिना उस संवाद के अच्छा साहित्य नहीं बन पाता। वह संवाद आज भी मौजूद है।

एक पाठक, रचनाकार से क्या उम्मीद करे ―

एक पाठक रचनाकार से अच्छी, सच्ची, प्रमाणिक किस्म की, विचारोत्तेजक, आनंददायी कृति की उम्मीद करता है। असल में, कई बार, पाठक को इस बात से मतलब नहीं होता कि कोई भी रचना किसी के समर्थन में है या विरोध में― उसे यह चाहिए कि कृति उसके विचारों व उसके जीवन के सत्य को जोड़कर चले व उसके जीवन का मार्ग प्रशस्त करते हुए कुछ नया पैदा करने का जज़्बा रखे ; तब वह उसे अच्छा मानता है।

एक लेखक के तौर पर हमें यह सोचना होता है कि हमारी रचना क्या उन सारे सवालों को सम्बोधित कर रही है, जिनमे पाठकों की दिलचस्पी होती है। तभी वह हमारी रचना को पढ़ना चाहेगा। और क्या हम उन नये सवालों को प्रस्तुत कर पा रहे हैं, जिनकी तरफ़ पाठक का ध्यान अभी तक नहीं गया है, लेकिन जो सवाल अनजाने ही उसके जीवन को प्रभावित कर रहे हैं।

गायत्री: जी, समय के साथ के संवाद ज़रूरी है। लेकिन एक सच्चाई देखें, तो बहुत सारी किताबें, आत्मकथाएं जो आज के सच को व्यक्त करती हैं, विरोधी ताकतों द्वारा उन्हें बैन कर दिया जाता है। क्या यह परम्परा पाठक को सच से दूर करने की एक कोशिश है?

गीत : किताब पर बैन किसी भी समय में लगाया गया हो, मैं कभी भी इसके पक्ष में खड़ा नहीं हो पाता हूँ। हम आधुनिक सभ्य समाज में रह रहे हैं, हमारे पास अभिव्यक्ति की आज़ादी होनी ही चाहिए। अभिव्यक्ति की आज़ादी का प्रयोग करते हुए अगर कोई अपना विचार प्रकट करता है जिसे दूसरा अपने ख़िलाफ़ मानता है तब भी एक लेखक को यह अधिकर होना चाहिए कि वह अपनी रचना के साथ खड़ा हो सके। आप किसी किताब से नाराज़ हैं, तो उसके विरुद्ध एक नई किताब लिखिए, लेकिन उस पर बैन लगाने को मैं कभी सही नहीं मान सकता। स्टेट के रूप में  भी आप रचना व रचनात्मकता पर अंकुश नहीं लगा सकते, नहीं लगाना चाहिए। लेकिन कई बार ऐसी सरकारें या ताकतें आ जाती हैं, जो कई बार इस तरह के अलोकतांत्रिक निर्णय लेती हैं, जो कि ग़लत है।

गायत्री: ऐतिहासिक रूप से साहित्य की यात्रा देखें तो प्रारम्भिक दौर में कविताएं लोक का विषय रही हैं। उन्हें गाया जाता रहा है। आज भी कविताएं मंचों से पढ़ी जा रही हैं। लेकिन साहित्यिक मानदंडों पर चल रहे कवि को वह ‘पॉपुलैरिटी’  नहीं मिलती, जो पूर्व में साखियों को गाकर कबीर को मिलती थी। साहित्यिक कवि से नेतृत्व खींचकर मंच पर कोई और ही पॉपुलर हो रहा है। इस अंतर को कैसे देखते हैं?

गीत- सोचिए कि क्या कबीर उतना लोकप्रिय होना चाहते थे, जितना वे हो गए……! दरअसल, अच्छा साहित्य इसलिए अच्छा है क्योंकि वह लोकप्रियता पाने की चाह से उपजा ही नहीं था। आज के साहित्य में भी जो लोग लोकप्रियता और उसके लोभ से ख़ुद को दूर रखेंगे, वे ही अच्छा साहित्य रच पांएगे। जैसा मैंने कहा, बीसवीं सदी में चीजों का वर्गीकरण होता चला गया। इसलिए साहित्य में भी मंच, मुख्य धारा, विदेशी, देशी आदि-आदि कैटेगरी बनती गई हैं। कभी सोचा है,  कबीर के जमाने में अगर बॉलीवुड होता, तो कबीर से ज़्यादा बॉलीवुड के गाने गाए जाते। उस दौर में  कविता के बहुत सारे विकल्प नहीं थे। साहित्य के बहुत सारे विकल्प नहीं थे।  लेकिन बीसवीं सदी में सिनेमा एक बड़े विकल्प के रूप में सामने आया । उसने साहित्य को कई तरह से चोटिल भी किया और नई कैटेगरीज पैदा की, जैसे फिल्मी गीत, फिर आया नया गीत इत्यादि। आज के दौर में मंचीय कविताओं की भी एक अलग श्रेणी है। ये सारी श्रेणियां ऐसे ही गुनगुनाने और क्षणिक आनंद के लिए चलती रहेंगी। परन्तु इसके समानांतर एक गम्भीर साहित्य अपने आप को स्थापित करता जाएगा। जैसे-जैसे हमारा समय बदल रहा है, वे चीजें जो अत्यंत लोकप्रिय रहेंगी, कलात्मक नहीं रह जाएंगी क्योंकि लोकप्रियता एक खास किस्म की आदत से तैयार होती है, उसका एक तय मीटर है जनता को उस मीटर की आदत है। मीटर को वह पकड़ लेगी और वह रचना लोकप्रिय हो जाएगीर लेकिन कालजयी नहीं बन पाएगी। क्षणिक आनंद देकर खत्म हो जाएगी। साहित्य में सबसे शक्तिशाली समय की छननी होती है  अगर आपके भीतर कुछ होगा, तब ही आप सर्वाइव कर पाएंगे अन्यथा समय आपको छानकर खत्म कर देगा।