जब मेरी चिंता बढ़े माँ सपने में आए

इंसान के तमाम रिश्तों पर बहुत कुछ लिखा पढ़ा गया है, मां और बेटे के रिश्ते पर भी लिखा गया है । मेरा यह निश्चित मत है कि की एक सीमित शब्द में एक असीमित संसार को समेटा जा सकता है ? मुझे नहीं लगता कि तमाम भाव की जननी को, समय के एक अंश के भाव से उपजे शब्द में समेटकर अपनी लेखनी से चला देना मां जैसे शब्द को परिभाषित करता है । मेरे लिए दुनिया के सारे रिश्ते में इंसान को मां जैसे होने चाहिए । बिना शर्त प्यार करने की हिम्मत, चेहरे के भाव पढ़ने कि कोशिश, क्योंकि एक मां के प्रेम में डूबा बच्चा ही प्रेम के असली मतलब को समझ सकता है । अख्तर अजमी की एक शेर है –

भारी बोझ पहाड़ सा कुछ हल्का हो जाए

जब मेरी चिंता बढ़े माँ सपने में आए

मैं जिस राज्य से आता हूं वहां विस्थापन एक बड़ी समस्या रही है, घर से दूर हम छोटे शहर के लोग जब जाते हैं तो सिर्फ मां को साथ ले जाते हैं और जब दुख और समस्याएं घेरती है तो सिर्फ अख्तर अजमी का यह शेर याद आता है और दर्द में हम सिर्फ “ए माय ही कह पाते हैं । हमारी भाषा की इस जुड़ाव को अगर समझने कि कोशिश की जाय तो हम महानगरों की तरह कोठी और बंगला नहीं कहते घर कहते हैं और घर के केंद्र में होती है मां, और जब मां नहीं होती है तो एक बच्चा मेरे बचपन की तरह घर से बाहर के चबूतरे पर बैठकर मां का इंतेज़ार कर रहा होता है, कभी आंखे रास्ते पर होती है और कभी आंखे झेप्ती है इस उम्मीद के साथ की नज़रे हटाने के बाद जब नज़र पड़े रास्ते पर तो अगली बार मां घर की ओर आती दिखे । उम्मीद की सारी किरणें ख़त्म होती है फिर भी हृदय कीं आवाज़ भी मां को ढूंढ रही होती है । इंसानी रिश्तों के व्याकरण को अगर समझा जाय तो मां के साथ रिश्ता अनौपचारिक लगता है । आप कोई आदर सूचक संबोधन के बोझ को महसूस  नहीं  कर पाएंगे, भाषा की बंदिशे खुलकर भाव के चादर ओढ़ लेती है और फिर सिमट कर मां, माई , मैया जैसे शब्दो के रूप में निकल जाती है । जीवन के तुला पर अगर सारी कमाई एक तरफ रख दी जाय और बचपन में मां की खोची से आंठ आने की प्राप्ति करने का संतोष भाव वहीं जीवन सत्य है । किसी भी लेखक या टिप्पणीकार के लिए मातृ भाव को शब्दो में समेटना सूर्य की किरणों के आगे दिए जलाने का निरर्थक प्रयास करने जैसा, पर फिर भी लोग करते है, जैसे मैं कर रहा हूं । अनायास ही आप सोच रहे होंगे क्यों ? क्योंकि जीवन रूपी प्रश्न की उत्तर समेटे रहने की एकमात्र शब्दावली होती है मां ।

राजेश रंजन ( संस्थापक संपादक )