धोबीघाट : ‘महानगर,भूख,हताशा की कहानी’

हम पूंजीवादी दौर में जी रहे हैं,यानि एक ऐसी व्यवस्था में,जो बाज़ारोन्मुख है।उत्पादन की इस व्यवस्था में उत्पादन के समस्त साधनों और अधिशेष पर निजी स्वामित्व है,जबकि उत्पादन मजदूर श्रम आधारित होता है।अर्थात,वे बहुत सारे लोग जो महानगरों में ऊंची-ऊंची बिल्डिंगे बना रहे हैं,उनका वास्ता केवल ईंट,गर्रा,मिट्टी ढोने और छत डालने भर तक है। उन बिल्डिंगों और इलाकों में,बनाने वालों के लिए कोई स्थान नहीं है,उनके ठिकाने तो कहीं दूर, शहर के किसी कोने में या रेलवे लाइन के किनारे,चूहों और मच्छरों वाली झोपड़पट्टियों में मिलेंगे। देश कागजों में ’47 के बाद से आज़ाद कहा जाता है।लेकिन असलियत में किन सन्दर्भों में आज़ादी मिली है,यह नहीं स्पष्ट हो पाता।साम्राज्यवादियों की तरह ही क्या यहाँ का अमीर तबका गरीब तबके को नहीं अलगा देता है? कुछ बस्तियों की चमचमाती रौशनियों और ऊंची इमारतों की छांव में क्या आज भी बजबजाती नालियों वाली बस्तियों को हिकारत से देखकर नकार नहीं दिया जाता? आख़िर भूख,बदहाली,गरीबी को पोस्टर से क्यों ढंक दिया जाता है? कूड़े के ढेर में भोजन ढूढ़ते बच्चे की आंखों में आंखें डालकर क्यों नहीं उसे राजनेताओं के दावे गिनवाए जाते ? क्या उस ओर रहने वाले, ‘हम भारत के लोग’ में शामिल नहीं हैं? दरअसल, उस ओर से इस ओर की दूरी बहुत कुछ साफ़ कर देती है।

संसाधनों के अनुचित बंटवारे से उपजी यह दूरी सिविल सोसाइटी व स्वतंन्त्रता,समानता,बंधुत्व के विचार को मात देती दीखती है।एक ओर पांच सितारे में पार्टियां,शैम्पेन,लज़ीज़ व्यंजन हैं,दूसरी ओर दाल-रोटी के लिए संघर्ष और टपकते छप्पर हैं। नहीं,जश्न बुरे नहीं हैं,असल बुराई,2% और 98% जनता के बीच इन अवसरों की असमानता है। ऐसे में भगत सिंह के सामाजिक क्रांति का स्वप्न बरबस याद हो आता है,जहाँ वे इंकलाब लाने की बात करते हुए कहते हैं-क्रांति आवश्यक है।यह पूंजीवाद,सामाजिक विभेदीकरण और विशेषाधिकारों की मौत की घण्टी बजाएगी। इससे ही एक नई व्यवस्था का जन्म होगा- एक नई सामाजिक प्रणाली।आज के भूखे भारत में सामाजिक क्रांति से ही असल आज़ादी आएगी।

भीड़भाड़ के बीच महानगर में व्यक्ति अकेला हो जाता है।सभी रिश्ते बाज़ार तक सीमित होते हैं।वहाँ गरीब आदमी का संघर्ष अमीर आदमी के लिए ‘आर्ट’ होता है,जिन्हें वह तस्वीरों में देखकर मंत्रमुग्ध होता है,चित्रकारियों में तराशता है,चर्चा करता है लेकिन उन तस्वीरों में जो लोग हैं,उनसे असलियत में वह कोई सरोकार नहीं रखना चाहता।यही बाज़ार है और यही बाज़ार का नियम।

2011 में आयी,किरण राव डायरेक्टेड ‘धोबीघाट’ भूख और अकेलेपन को बड़ी संजीदगी से पर्दे पर दिखाती है। यह फ़िल्म मुंबई के महानगरीय जीवन में चार अलग-अलग लोगों (मुन्ना,शाई,अरुण और यास्मीन) के अनुभवों को उकेरती नज़र आती है,जो क़िस्मत से एक-दूसरे से मिलते हैं। छोटे शहर की यास्मीन पति के साथ बम्बई बहुत सारी उम्मीदें लेकर आती है और धीरे धीरे वो शहर की खोखली भीड़भाड़ में अकेलेपन को महसूस करते हुए कैमरे के सहारे जीने लगती है। अरुण (आमिर खान) तलाक़शुदा नामचीन पेंटर है और जीवन में अकेलेपन को ही अपना साथी बना चुका है। घर की कमी खले,इससे पहले ही वह मकान बदल देना चाहता है।एक नए मकान में उसे यास्मीन के तीन वीडियो कैसेट्स मिलते हैं,जिनसे वह शहर और जीवन के अलग-अलग शेड्स से गुज़रता है और अंततः जानता है कि शहरी भीड़भाड़ ने यास्मीन को निगल लिया।

    न्यूयॉर्क से बम्बई आई मशहूर उद्योगपति की बेटी शाई (मोनिका डोगरा) ब्रेक लेकर छोटे कामगारों के जीवन पर रिसर्च कर रही थी। शाई और उसकी माँ ‘आर्ट’ की शौक़ीन होती हैं।जीवन के संघर्ष,रोज़मर्रा की ज़रूरतें,दुख-अवसाद की पेंटिंग्स की सराहना करते हुए वे संवेदना की प्रतिमूर्ति लगती हैं,लेकिन यह बिंब टूट जाता है और शाई की माँ की साम्राज्यवादी प्रवृत्ति खुलकर सामने आती है,जब शाई और उसके पिता इस बारे में बात करते हुए कहते हैं कि धोबीघाट से वापस आने पर उसकी माँ होतीं तो कहतीं,’ उसे वैक्सीनेशन शॉट चाहिए होगा।’

    फ़िल्म के मूल में दरभंगा से भागकर बम्बई आया लड़का (प्रतीक बब्बर) है,जो इस बात के जवाब में कि वह बम्बई क्यों आ गया,कहता है कि ‘वहाँ हमेशा भूख लगी रहती थी।’ यह संवाद फ़िल्म का डायलॉग भर नहीं,बल्कि सच्चाई है।भारत विश्व में सर्वाधिक भूखों का देश है। 2019 में आयी ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रिपोर्ट में 217 देशों में भारत 202वें स्थान पर है। 2010 के बाद से भारत में भूखे लोगों की संख्या में वृद्धि ही हुई है।….मुन्ना दिन में धोबी का काम करता है और रात में चूहे मारकर गुज़ारा करता है। वहीं फ़िल्म बड़ी संजीदगी से यह भी बताती है कि गरीब आदमी की भूख किस तरह उसे ज़ुर्म की ओर ले जाती है,जब मुन्ना का मौसेरा भाई गुज़ारे के लिए ड्रग्स के धंधे में उतर जाता है और फिर गैंग वॉर में मार दिया जाता है।फ़िल्म यहाँ चुप्पी में फिर सवाल पूछती नज़र आती है कि क्या बदलाव के नाम पर भारत में बस सरकारें और उनके कोरे वायदे बदलेंगे? असल में,गरीबों की स्थिति हाइवे पर चौंधियाते चूहे की तरह है,जिसे आने-जाने वाली कोई भी गाड़ी कभी भी रौंद देती है। 

    फ़िल्म के आख़िर में गरीब आदमी की हताशा है,हताश होकर अपनी यथास्थिति को स्वीकार कर लेना है।मुन्ना शाई के प्रति अपने प्रेम को व्यक्त नहीं कर पाता,बरबस उसे अपने ‘स्टेटस’ का ख़याल आ जाता है। लगातार बदलते राजनीतिक परिदृश्य और अपने स्थिर स्टेटस को स्वीकार करके वह शाई को अरुण का एड्रेस दे देता है।दरअसल, हर बार व्यक्ति में इतना साहस नहीं होता कि वह यथास्थिति को चुनौती दे पाए,जीवन के न ख़त्म होने वाले थपेड़े सहकर वह चुप्पी के साथ यथास्थिति को स्वीकार कर लेता है।…..यास्मीन और मुन्ना चुप रहना चुन लेते हैं,ठीक वैसे ही जैसे हर बार शोषण के ख़िलाफ़ नक्सलबाड़ी नहीं होता,आत्महत्याएं हो जाती हैं!