पंचायत पर पंचायती

Panchayat Official Poster

नीलेश मिश्रा के “द स्लो इंटरव्यू” की प्रस्तुति करता है- गाँव कनेक्शन स्टूडियो। इस इंटरव्यू में नीलेश मिश्रा छोटे शहर या कस्बों से शहर गए लोगों की सरलता और जड़ों से जुड़े रहने की कहानी दुनिया के सामने लाने की कोशिश करते हैं। इन दिनों अमेज़न प्राइम पर प्रसारित सीरीज़ ‘पंचायत’ की कहानी निदा फाजली के शेर को चरितार्थ करती मालूम पड़ती है-
“नैनों में था रास्ता, हृदय में था गाँव
हुई न पूरी यात्रा, छलनी हो गए पांव।”

वैश्चिक स्तर पर मानवता के संकट से जूझते दौर में जब विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र, जिसे ग्रामीण प्रधान देश कहा जाता है, वहाँ मज़दूरों को भुखमरी और बीमारी के बीच चुनाव करना हो तो अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं होगा कि पलायन कितनी बड़ी समस्या है। अभिषेक के किरदार में (टीवीएफ फेम जीतू भईया) ने बड़े करीने से एक ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया है, जिसे भरपूर मेहनत न कर पाने का मलाल है। उसे लगता है,यदि मेहनत करता तो किसी अच्छी कंपनी में प्लेसमेंट हो जाती। दरअसल, उसका किरदार कॉलेज के छात्रों की महत्वाकांक्षा को दर्शाता है। अभिषेक के किरदार ने सरकारी नौकरी की ज़हालत पर भी व्यंग्य किया है, जहाँ जीवन जुगाड़ पर आश्रित टूटे पहियों की तरह खींचा जाता है। मजदूर का पंचायत सचिव से पैसा मांगना, लालफ़ीताशाही को दर्शाता है। यह सपने देखने और उन्हें पूरे करने के निश्चय की कहानी है,जहाँ एक कामकाजी व्यक्ति ने दृढ़-निश्चय के बल पर कैट से परीक्षा में सफलता का परचम लहराया है। अभिषेक मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि के व्यक्ति की झलक है। इससे इतर विकास का किरदार (चन्दन रॉय) ग्रामीण सजीवता को जीवंत करता हुआ नजर आता है। उसकी बात-चीत में वर्तनी की अशुद्धियों पर अभिषेक का टोकना दरअसल कान्वेंट स्कूल एवं सरकारी स्कूल के बीच के अंतर को रेखांकित करता है। दरअसल,आज का ‘चन्दन’ अपने अभिनय से कल के नवाज़ की छाप छोड़ता दीखता है। जब विकास द्वारा अभिषेक को यह कहते सुनते हैं कि ‘अभियो खून नहीं खौला है त आपका ख़ून,ख़ून नहीं पानी है।’ उनके बीच सहज संवाद से उपजे भाव बेहतरीन कलाकारी का एहसास दे जाएंगे। विशेषकर, उसका यह कहना कि ‘एक ठो बात बताएं अभिषेक सर’, पूर्वांचली पृष्ठभूमि के प्रत्येक व्यक्ति को भीतर तक छू जाएगा।
इस कहानी में ग्रामीण पृष्ठभूमि में मौजूूद ‘क्लास स्ट्रक्चर’ को स्पष्टता से दर्शाया गया है; प्रधान जी जब अपनी पत्नी से यह कहते हैं कि ‘लड़का अपनी ही जाति का है’, तो यह दिखाता है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी भारतीय गाँव जातिगत बेड़ियों से मुक्त नहीं हुए हैं। ग्रामीण परिवेश की रूढ़ियों पर ‘सटायरिकल कमेंट’ कहानी को सच के करीब ले जाता है, हास्य के माध्यम से डायरेक्टर दर्शकों तक जो संदेश पहुंचाना चाहते थे, वह बखूबी पहुँच रहा है। पोस्ट-मॉडर्न युग में जब एकल परिवार अस्तित्व में आ रहे हैं, ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में सहभागिता (परमेश्वर जी की बेटी की शादी में ‘पंचायत सचिव’ का हाथ बंटाना) यह दर्शाती है कि उत्तर आधुनिक होकर शहरों ने बहुत कुछ गंवा दिया है, जिसे भारतीय गाँव अभी भी सहेजे हुए हैं।
आप चक्के वाली कुर्सी की प्रतीकात्मकता को भी समझिए, यहाँ समाज के ‘पॉवर स्ट्रक्चर’ को उस कुर्सी से जोड़ कर बड़े ही कारगर ढंग से दर्शाया गया है। बहसों में नारीवाद और धरातल पर मौजूद यथार्थ को भी बड़ी मुखरता से दर्शकों के बीच रखती है-पंचायत। भारतीय लोकतंत्र की शब्दावली में प्रधान-पति अथवा मुखिया-पति होना इस बात को दर्शाता है कि फ़ेमिनिज्म की तमाम बहसों के बीच इस समाज में औरतें कहाँ हैं,धरातल पर इसी सच्चाई को ‘पंचायत’ मुखरता से बताती नज़र आती है। अव्वल तो यह कि ये इसके बावजूद भी ‘स्लोगन’ जैसे महत्वपूर्ण और कठोर निर्णय प्रधान-पति मंजू देवी की मदद से ही ले पाते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों में सामंजस्य कितना महत्वपूर्ण है और घर में आंतरिक लोकतंत्र की महत्ता जैसे मुद्दों को सार्थकता से उजागर करती है-पंचायत। जो लोग भी अपने भीतर के गांव को जीना चाहते हैं, उनके लिए पंचायत ‘मस्ट वॉच’ है। श्री लाल शुक्ल ने ‘राग दरबारी’ में लिखा है कि ‘शहर का किनारा छोड़ते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता है’; फुलेरा ग्राम पंचायत में आप भारत की सारी पंचायतों की झलक देख पाएंगे। चन्दन रॉय (भईया) को शुभकामनाएं, आप आने वाले कल के ध्रुव तारा हैं।

समीक्षक : राजेश रंजन, संस्थापक संपादक, सोशियो लीगल लिटरेरी
संपादक : गायत्री यादव, प्रबंधक संपादक, सोशियो लीगल लिटरेरी