पीएम केयर फण्ड एवं संवैधानिक संस्थाओ की मान्यता पर उठते सवाल

कोविड -19 ने दुनिया भर की व्यवस्थाओं की खामियों को उजागर किया है संसदीय लोकतंत्र में संसद की भूमिका पर उठते सवाल, सिमटता सुचना तंत्र, मूल सुविधाओं को तरसती जनाबादी, एवं चुने हुए प्रतिनिधियों की बेरुखी ने दुनिया भर के लोकतंत्र और नागरिकों के रिश्तों को पुनर्भाषित किया है। आशा और प्रत्याशा के बीच, दुनिया भर के सफल लोकतंत्रों की एक समानता पारदर्शिता एवं सुचना तक नागरिको की पहुँच रही है। भारतीय लोकतंत्र में सुचना के अधिकार को सुचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत किर्यान्वित किया गया और नागरिको तथा सरकारों के बीच गहरी होती खायी को पाटने की एक कोशिश की गयी। इससे पहले की हम पीएम केयर फण्ड, आर टी आई और कैग की औचित्यिता पर जाए यह जरुरी है की हम आर टी आई के कार्य एवं उसमे हुए नवीनतम संशोधनों को समझें।

आर टी आई अधिनियम के कार्य –

आर टी आई अधिनियम 2005 जन – संस्थाओं को अपने संगठन, संरचना एवं वित्तीय जानकारी की सूचना को 30 दिन के भीतर आवेदनकर्ता को सूचित करने के लिए बाध्य करती है। “सूचना” जो आर टी आई अधिनियम 2005 की धारा 2 उपखंड ( फ ) के अंतर्गत परिभाषित है – “सूचना” का अर्थ किसी भी रूप में किसी भी सामग्री से है, जिसमें रिकॉर्ड शामिल हैं, दस्तावेज़, मेमो, ई-मेल, राय, सलाह, प्रेस-विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, लॉगबुक, अनुबंध, रिपोर्ट, कागजात, नमूने, मॉडल, डेटा सामग्री किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रूप में और किसी भी निजी निकाय से संबंधित जानकारी, जिसके तहत एक सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा उस समय में लागु किसी भी कानून के द्वारा पहुँचा जा सकता है. सुचना आयोग में एक मुख्य सुचना आयुक्त सहित 10 सुचना आयुक्त होते हैं जिनकी नियुक्ति पांच वर्ष के लिए राष्ट्रपति द्वारा की जाती है एवं इनकी सैलरी चुनाव आयुक्त के समकक्ष होती है ताकि गैर जरुरी सरकारी हस्तक्षेप एवं सांस्थानिक स्वयात्तयता बची रहे। वर्ष 2019 में सूचना आयोग की स्वयत्तयता को ठेस पंहुचाते हुए तत्कालीन भाजपा सरकार ने इसको संसोधित करते हुए सुचना आयुक्त के निश्चित कार्यकाल एवं सैलरी निर्धारण की शक्ति को सरकार के जिम्मे कर दिया जिससे सुचना आयोग की सांस्थानिक स्वायता खतरे में आ गयी। सुप्रीम कोर्ट ने थालाप्पालाम सेर कारपोरेशन बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य में यह माना कि “सुचना का अधिकार संविधान के अन्नुछेद 19 के भाग (1 ) के उपभाग ( अ ) का महत्वपूर्ण हिस्सा है।” मेरा यह निश्चित मत है की पीएम केयर फण्ड एवं पारदर्शिता के उठते सवाल सरकार के बीते साल के सुचना तंत्र या संस्थाओ पर सतत प्रहार से अलग है, वो चाहे आलोक सिन्हा और राकेश सिन्हा विवाद में सीबीआई पर हमला हो या पूर्व मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई के ऊपरी सदन में मनोयन के जरिये न्यायपालिका पर उठते सवाल। गहरे होते सवालों के बीच संकट के समय में पीएम केयर फण्ड के जरिये कैग की औचित्य पर सवाल खड़ा करना यह दर्शाता है की भारत में सांस्थानिक संकट किस स्तर पर है। 28 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष से इतर प्रधानमंत्री नागरिक सहायत्ता एवं राहत फण्ड का सृजन किया गया। एक आर टी आई के जवाब में यह पाया गया की यह कोष पब्लिक ऑथिरिटी के परिभाषा में नही आता जबकि आर टी आई अधिनियम की धारा 2 ( h ) के उप भाग डी में यह साफ है की सरकार द्वारा गठित ऐसे कोई भी संस्थान जो सरकार के किसी आदेश द्वारा सृजित या वित्तीय रूप से पोषित किया गया हो या स्वामित्व में हो या निर्देशित किया गया हो जन- प्राधिकरण की परिभाषा में आता है। जब यह एक जन सस्था है तो नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक जो सविधान के अनुच्छेद 148 के तहत संपरीक्षा के लिए संविधानिक संस्था है उसे सम्परीक्षण हेतु क्यों नहीं रखा गया? क्या यह एक संविधानिक संस्था को उसके कार्यो से वंचित करना नहीं है? सुप्रीम कोर्ट ने एस सुब्रह्मण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु सरकार में यह कहा “संविधान निर्माताओं ने इस संस्था की परिकल्पना सरकार की तमाम वित्तीय गतिविधियो पर नज़र रखने के लिये किया था।” संविधान के अनुछेद 148 कैग के रूप में एक संविधानिक अहलकार को सृजित किया है। गौरतलब है की कैग की रिपोर्ट पर टिपण्णी एवं जाँच का अधिकार भी संसद को है और संसदीय लोकतंत्र में खासकर कोविड के दौर में संसद की भूमिका नगण्य रही है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिम है की जिस तरह से संविधानिक संस्थाए संकट के दौर में अस्तित्व के संकट से गुजर रही है वो लोकतंत्र के मूल तत्वों से इतर एक कार्यपालिका शासित तंत्र की ओर न विमुख हो जाये ?

-राजेश रंजन ( संस्थापक संपादक, सोशियो लीगल लिटरेरी एवं सलाहकार, कॉन्स्टिट्यूशनल लॉ सोसायटी, राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, जोधपुर)