पुस्तक समीक्षा : रुकतापुर

बशीर बद्र की एक शेर है “जी बहुत चाहता है कि सच बोले, क्या करें मगर हौसला नहीं होता”। पत्रकार पुष्यमित्र की किताब रूकतापुर में सच भी है और उनमें सच कहने का हौसला भी है । राजकमल प्रकाशन से आई यह किताब बिहार की स्वंतत्रता की बाद की यात्रा की कई परतें खोलती नज़र आती है, यह इतिहास को वर्तमान के आयने में भी सामने रख देती है । अगर आप मेरी तरह बिहार के रहने वाले पाठक हैं तो किताब धीरे-धीरे आपको आपके पहचान के सामने यह दुविधा खड़ी करेगी, की बिहार की परिस्थिति या दुर्दशा पर भावुक होकर रोएं या सत्ताधारियों से प्रश्न करें? किताब जमीनी शोध, और जमीनी मुद्दों को मुखरता से रखती नज़र आती है, बाढ़, भूमिहीनता, शिक्षा, रोजगार, पानी जैसे जरूरी मुद्दों के इर्द गिर्द बुनी गई कहानी एक पत्रकार का यात्रा वृतांत है जो वोटर और नेता दोनों को आयना दिखाता है । आज़ादी के बाद भी भूस्वामित्त पर जाति का प्रभाव, दलितों का जूठा बटोर कर लाना, बुलेट ट्रेन और पांच ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी वाले इस देश पर तमाचा है । मुझे समीक्षा नहीं आती है मैं एक पाठक के तौर पर यह निश्चित कहूंगा की लेखक का जमीनी होना इस किताब की खूबसूरती है, पत्रकारिता धर्म की ईमानदारी भी देखने को मिलती है जब काम के सिलसिले में लेखक सुमो को मनाकर अपने साथी के गाड़ी से पेट्रोल भरवाकर जाने की बात करता है, टीआरपी, नंबर वन, के इस मायाजाल में बिहार के एक जिले से निकला पत्रकार दुनिया को अब भी एक संदेश दे रहा है “पिक्चर अब भी बाकी है मेरे दोस्त” – पत्रकारिता बची है अभी । शादियों में असमानता, व्याप्त वर्ण व्यवस्था, हमारे समाज के दकियानूसी सोच को भी उजागर करता है । आज भी सूरत देखकर प्रेम करने वाले, शादी करने वाले, दहेज के मोल जोल करने वाले लोगो के लिए पुष्यमित्र की किताब सामाजिक परिवर्तन का संदेश भी देती नज़र आती है । एक तरफ देश के दूसरे समाजों में स्त्री विमर्श के मुद्दों को समर्थन देना, एसिड सर्वाइवर्स की मदद करना वहीं दूसरी तरफ बिहारी समाज का एसिड अटैकर की शादी में शामिल होना, पीड़िता का सामाजिक बहिष्कार करना इस समाज के भीतर के खोखलेपन को मानो ऐसे बाहर लाकर रख देता है जैसे, बुद्ध और महावीर की धरती पर दंभ भरने वाले लोगों को बुद्ध ने सपने में उन्हें स्याह सच दिखा दिया हो । किताब के चौथे भाग में आप फिर इस दो राहें पर खड़े होंगे कि हम अपनी सामाजिक व्यवस्था पर शर्म करें या व्यक्तिगत प्रयासों द्वारा पेश की गई मिशालों पर गर्व? समाज का अंतर्विरोध कब भीतर के अंतर्विरोध में समा जाता है पता नहीं चलता है । अपराध और राजनीत का गठजोड़, दलित अत्याचार, औपनिवेशिक कानून से स्वदेशी दमन, बिहार में उद्योगों की समस्या, पलायन, जैसे सामाजिक मुद्दों पर कलम की शक्ति और पत्रकारिता की उम्मीद जगाती यह किताब “सामाजिक टॉनिक” है जिसे गटक लेना चाहिए, चाहे बिहारी हो या गैर बिहारी । बिहारी को तो इसलिए भी पढ़ना चाहिए, की प्रसव की पीड़ा तो प्रसूति ही समझती है यही हाल हम बिहारियों का है और गैर बिहारियों को इसलिए पढ़ना चाहिए की टीवी हेडलाइन, यूपीएससी और लिट्टी चोखे से इतर वो बिहार को बिहार के द्वारा ही समझ पाएंगे ।
(मुझे समीक्षा का कोई अनुभव नहीं है, एक पाठक के तौर पर जो महसूस करता हूं वही लिखता हूं, किसी भी त्रुटि के लिए अग्रिम माफी, पुष्यमित्र सर को शुभकामनाएं)

-राजेश रंजन