रूम ऑन द रूफ़

गायत्री यादव, सीनियर मैनेजिंग एडिटर

रूम ऑन द रूफ़ रस्किन बॉन्ड का पहला उपन्यास है, जिसके लिए उन्हें जॉन ल्यूलिन राइज़ मेमोरियल सम्मान दिया गया था। इस उपन्यास के क़िस्सों में बॉन्ड साहब के जीवन की झलक मिलती है, जैसे अज्ञेय ने शेखर-एक जीवनी उपन्यास लिखा, जिसका मूल व्यक्तित्व ‘शेखर’ अज्ञेय से मिलता जुलता है, ठीक उसी तरह रस्टी भी बहुधा बॉन्ड साहब का व्यक्तित्व ही जान पड़ता है।

बॉन्ड साहब को प्रकृति, पहाड़, नदियों, घाटियों से कितना प्रेम है, यह बात छिपी नहीं है। मसूरी में आकर बसने और प्रकृति की गोद में लेखन करने का चयन प्रकृति के प्रति उनके प्रेम को बड़ी स्पष्टता से प्रकट करता है। इसी अनन्य प्रेम की झलक उनके पहले उपन्यास-‘रूम ऑन द रूफ़’ में मिलती है। कभी वे मौसमी ताज़गी की बात करते हैं तो कभी पहाड़ियों से लिपटे रास्ते की, कभी छत से दीखते सुदूर विस्तृत नीले आसमान का ब्यौरा देते हैं तो कभी उस हरी बेल का ज़िक्र है, जो खिड़की खुलने के कारण भीतर घुस आयी है।

मूल रूप से, यह उपन्यास एक ऐसे लड़के की ज़िन्दगी के इर्द-गिर्द बुना गया है, जिसके माता-पिता मर चुके हैं और उसे उसके चाचा ने, जो सम्भ्रान्त अंग्रेज़ी परिवार से हैं, पाला है। उसका चाचा क्रूर है और आज़ाद भारत में भी उनकी साम्राज्यवादी सामंतवादी प्रवृत्ति जस की तस बनी हुई है। टीनएज से अडल्ट होते लड़के की यह कहानी जीवन के संघर्षों से जूझते हुए दोस्ती और प्रेम जैसे संबंधों के नए आयाम पेश करती है। साथ ही, यह भी बताती है कि जातिवादी व्यवस्था की जड़ों ने कैसे पढ़े-लिखे अंग्रेज़ी तबके तक को अपनी गिरफ़्त में ले रखा है जिससे आज़ादी के बाद भी देश आज़ाद नहीं हो पाया है।

रस्टी एक ऐसा लड़का है, जिसे असली दुनिया से काटकर तमाम बंधनों में रखा गया है और यही कारण है कि बाहरी परिवेश देखने व जीने के लिए उसकी उत्कंठा और तीव्र होती जाती है। यह उपन्यास बताता है कि भारत में रहते हुए भी अंग्रेजों ने अपनी नस्ल को भारतीयों से अलग, ‘उच्च’ बनाए रखने का सर्वथा प्रबंध किया हुआ था। बाज़ार, जहाँ हिंदुस्तानी’पन’ अपने सम्पूर्ण स्वरूप में मौजूद था, वह रस्टी के चाचा के मुताबिक़ ‘चोरों और नुकसान पहुंचाने वालों’ से भरी हुई जगह थी। आख़िरकार, एक रोज़ रस्टी इन बंधनो को तोड़कर बाज़ार, हिंदुस्तान और ज़िन्दगी, तीनों को जीने के उद्देश्य से बाहर निकल जाता है जहाँ वह असली भारत से परिचित होता है और उसे ज़िन्दगी का पहला दोस्त सोमी मिलता है। बाज़ार जाकर उसने नियम तोड़ दिया था और नियम तोड़कर रस्टी बाग़ी हो गया था। दरअसल, बाग़ी हो जाना भर महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है, उसके बाद की जीवन-यात्रा और अपना अस्तित्व; रस्टी ने लड़ते, जूझते, थकते, उठते हुए अपनी वह यात्रा ज़ारी रखी, जिसके दौरान उसने कुछ नए रिश्ते गढ़े। यहाँ एक पाठक के रूप में हमें समझना चाहिए कि बहुत सारी कहानियां और अनुभव हमें केवल इसलिए सीखने चाहिए ताकि बहुधा विषम परिस्थितियों में भी हम स्वंयम् को नितांत अकेला अथवा उक्त स्तर की समस्या से पीड़ित एकमात्र व्यक्ति महसूस कर निराश न हों, बल्कि यह जान लें कि अलग-अलग समय में लोगों ने विषमताओं से होड़ लेकर अपने लिए मार्ग बनाए हैं।

चूंकि रस्टी एक जवान लड़का है और जीवन में उसने सदैव उपेक्षा झेली है, अब अपने बल पर जब उसे नौकरी मिलती है तब वह सारी उपेक्षाओं के ख़िलाफ़ उसे एक मज़बूत जवाब के रूप में रखकर संतुष्ट होता है और मालकिन से मिले छत के कमरे में गंजी मैना और छिपकलियों की आवाजाही को देखते हुए ख़ुश हो जाता है। यह ख़ुशी केवल इतनी भर नहीं है। रस्टी कुछ और भी महसूस कर रहा है―उसके पेट में तितलियां उड़ रही हैं जो मीना कपूर के होने पर और कुलांचे मारती हैं। पिकनिक के दौरान एक अधेड़ विवाहित स्त्री के प्रति अपनी समूची भावनाएं उड़ेलते हुए रस्टी के लिए यह महत्वपूर्ण ही नहीं रह जाता कि मीना उस लड़के की माँ हैं जिसे पढ़ाने के वास्ते वह उनके घर में रहता है। यहाँ रस्टी तमाम बने बनाए रूढ़ मानदंडों को तोड़ता हुआ ‘मीना की सहमति’ से उसे अपनी कोरी भावनाएं अर्पित करता है, तभी वह बोल पड़ती है―

‘सुनो जंगल क्या कह रहा है।’
‘मुझे तो कुछ सुनायी नहीं दे रहा है।’
‘यही तो मैं कहना चाहती हूँ―कुछ न सुनो।’
और इसके बाद बिना सोचे रस्टी ने मीना को बाहों में भर लिया।

इस तरह, रस्टी का बाग़ी होना अकारण नहीं है। असल में, वह अपने स्वभाव में ही बाग़ी है, जो रूढ़ियों व विभेदकारी नियमों को तोड़कर अपने लिए वह चुनता है, जो वह चुनना चाहता है, उसके चयन का पैमाना मात्र तर्क आधारित नहीं है बल्कि एक व्यक्ति के तौर पर वह भावनाओं को भी उचित महत्व देता है और संबंधों के नए खाके गढ़ता है, जिसकी झलक उसके और किशन (मीना का बेटा) के संबंध में मिलती है।

कुल मिलाकर, रस्टी एक ऐसा लड़का है, जैसा हम सब होना चाहते हैं। वह आज़ाद होना चाहता है, पहाड़ों, जंगलों में भाग जाना चाहता है, किसी को भरपूर प्यार करना चाहता है, किसी का ‘सबसे अच्छा’, एकमात्र ‘सबसे अच्छा’ दोस्त होना चाहता है, वह सफ़ाई वाले लड़के और अपने बीच की दूरी की सच्चाई जानना चाहता है और तो और रस्टी कभी बूढ़ा नहीं होना चाहता!

हम सब रस्टी हैं। हम सब रस्टी होना चाहते हैं।

रस्किन बॉन्ड का यह उपन्यास टीनएज और एडल्टहुड की सारी आकांक्षाओं को उभारते हुए देहरादून की गलियों, बाजारों, घरों, गांवों में विचरण कराता है और चुपके से भारतीय समाज में फैली जातिप्रथा को खोलकर हमारे सामने रख देता है। ‘जंगल ही जंगल’ के माध्यम से लेखक प्रकृति को उन्मुक्तता के असली स्त्रोत दिखाना चाहता था, जिसमें वह सफ़ल होता है।