शहर, संस्कृति एवम् साहित्य

[लखनऊ को 14 नवंबर 2019 से पहले अजीज़ दोस्त आदित्य, और अभिषेक की नज़र से समझा, लखनऊ की बात करने के दौरान एक अलग क़िस्म की चमक होती थी इनकी आंखों में, जो इस शहर की रौनक को बिना शब्दों के बयां कर देती थी। मैं 14 नवंबर 2019 को इस शहर में पहली बार आया और फिर इसे बड़े भैया रजत, आकाश, और आयुष की नज़रों से समझा कि इस शहर में एक चमक है जो मुझे बनारस के बाद किसी शहर से जोड़ रही थी, और अपनाए जा रही थी। 26 नवंबर 2019 को लखनऊ हाई कोर्ट के कॉन्फ्रेंस रूम में जब मैंने बतौर लॉ इंटर्न (जस्टिस राजेश सिंह चौहान) संविधान दिवस पर गांधी की कहानियां सुनाते हुए एक आवाज़ को अपनी जेहन में उतरते हुए सुना तो समझा कि ये शहर है या शब्दों का जादूगर, वो आवाज़ थी- दास्तानगो, हिमांशु बाजपेयी की, जो मेरे लखनऊ के संस्मरण से जीवन संस्मरण का एक प्यारा हिस्सा बन गई]

राजेश : सोशियो लीगल लिटरेरी के साहित्यिक इंटरव्यू सीरीज़ की आख़िरी कड़ी में हमारे साथ हैं, किस्सा-किस्सा लखनऊआ के लेखक एवं दास्तानगो हिमांशु बाजपेयी। स्वागत है सर आपका एवम् शुक्रिया हमसे बात करने के लिए।

हिमांशु : जी शुक्रिया।

राजेश : पहले तो आपका परिचय और क़िस्सागो पर आपकी टिप्पणी?

हिमांशु : मेरा नाम है हिमांशु वाजपयी और सवाल में आपने परिचय पूछा है, तो मेरा परिचय यह है कि मैं कहानियां सुनाता हूँ, किस्से सुनाता हूँ, ख़ासतौर पर लखनऊ के किस्से सुनाता हूँ क्यूंकि लखनऊ मेरा अपना शहर है, लखनऊ के अलावा भी किस्से सुनाता हूँ और दास्तानगोई एक शैली है कहानियां सुनाने की तो दास्तानगो भी कह सकते हैं आप। इससे इतर हटकर भी कहानियां सुनाता हूँ, एक किताब आयी है किस्सा- किस्सा लखनउवा, राजकमल प्रकाशन से, बेस्ट-सेलर है, तीन संस्करण आ चुके हैं।…. किस्सागोई पर टिप्पणी ये है कि बहुत अहम फ़न था, हमारी हिन्दुस्तानी परंपरा का और अभी भी हम फ़न की तरह नहीं देखे तो यह आम तौर पर हर घर में हर मोहल्ले में और लोकैलिटी में कुछ लोग होते हैं, जो बहुत अच्छे किस्सागो होते हैं, हमारे आपके मित्र-मंडली में ऐसे कई सारे लोग होंगे जो किस्सागो होंगे, प्रोफेशनल तौर पर नहीं पर कहानियां सुनाने में वे बड़े बड़े प्रोफ़ेशनल्स से अच्छी कहानियां सुनाते होंगे जिनको देखकर आप सलाह भी दे चुके होंगे कि आप तो चैनल बना लो, तुम तो परफॉर्म करो, तुम तो सुनाओ स्टेज़ से, मजा आ जाएगा, फिल्मों में जाओ, लिखो!

मैं इसे प्रोफ़ेशनल तौर पर करता हूँ, फुल टाइम, जिसे जीविका कहते हैं वो यहीं से आती है।

राजेश : सर, हरेक शहर का अपना इतिहास होता है, लखनऊ का इतिहास तो अविस्मरणीय है, लेकिन क्या आप इस बात पर प्रकाश डालना चाहेंगे जो आपने किताब में भी मेंशन किया है कि लखनऊ में सिर्फ नवाबों की कहानियां नहीं है, आम लोगों की कहानियां भी है। आप लखनऊ के लोक केन्द्रित इतिहास को साहित्यिक दृष्टिकोण से कैसे देखते हैं?

हिमांशु : साहित्यिक दृष्टिकोण से क्या मुराद है, यह मुझे नहीं पता, मैं यह मानता हूँ कि लोक केन्द्रित इतिहास ज़्यादा से ज़्यादा लिखा जाना चाहिए, क़िस्सों को ज़्यादा से ज़्यादा सहेजना चाहिए, क़िस्से हमें उस समय के लोगो की मनोवृत्तियों व उनकी असलियत के करीब ले जाते हैं, तो इसलिए ये बहुत इंपॉर्टेंट है। इसलिए लोक केन्द्रित इतिहास जिसे आप कह रहे हैं, वह बहुत अहम है, वह किसी शहर के बारे में बहुत से सत्यों का उद्दघाटन भी करता है। जैसे लखनऊ की जो ब्रांडिंग हुई, वह नवाबी किस्सों के इर्द-गिर्द हुई, जो सामंती मनोवृत्ति है, पैलेस कल्चर है, साज़िशें हैं (1857 का जो मामला है) इमारतें है, खान-पान है, लेकिन जो आवामी पक्ष के खान-पान पर ज़्यादा बात नहीं होती। किस्सा-किस्सा लखनऊवा के जरिए यही कोशिश की गई थी। ऐसा नहीं है सिर्फ हमने किया, पहले भी लोगो ने किया है जिनसे प्रेरणा लेकर इस पीढ़ी में हमने भी किया है। हमने प्रेरणा ली ‘अमृत लाल नागर’ से, उन्होंने लखनऊ पर काफ़ी काम किया है, ‘योगेश प्रवीन’ जी इस बार इन्हें पदमश्री मिला है, वे मेरे गुरु हैं। हिंदी में लखनऊ को किसी ने उनसे बेहतर नहीं लिखा है। वे मेरे मेंटर हैं मतलब मेरी तरबियत में शामिल हैं। योगेश जी की इंस्पिरेशन रही, फिर लखनऊ के बुज़ुर्गों का भी आशीर्वाद रहा, रोशन ताकी साहब हैं, अनिश अशफ़ाक़ साहेब रहे, केपी सक्सेना साहेब रहे, अखिलेश दीक्षित (जिन्हें दीपू दद्दा हम कहते थे ), इन्होंने भी हमें काफ़ी सराहा। इसी वजह से हम इस तरफ आ गए। अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, जो अवधी के बड़े विद्वान है, उनका अहम योगदान रहा, उन्होंने मेरी एक समझ बनाई आज से 8-10 साल पहले, लोक, अवध और फिर अवधी को लेकर।

राजेश : सर, आप युवा हैं। मेरे जैसे उन युवाओं के प्रेरणास्रोत है  जिनकी लेखन में रुचि है। उनके लिए आप क्या संदेश देना चाहते हैं? कई बार बहुत सारे लोग आर्थिक-पारिवारिक बंदिशों की वजह से अपनी रुचि से समझौता कर लेते हैं।

हिमांशु : देखिए, कमज़ोर आर्थिक पृष्टभूमि वाले व्यक्ति के लिए कला में अपने आप को पूरी तरह झोंक देना जोख़िम भरा हो सकता है।….हालांकि अगर आपके भीतर लिखने की ललक है तो कोई आपको रोक नहीं सकता। लोग ऐसा मानते हैं कि नौकरी काफी हेक्टिक होती है, आदमी निचुड़ जाता है तो लिख नहीं सकता, होता भी है ऐसा। लेकिन अगर बहुत ही ज्यादा, एक्सप्रेस करने की चीज है तो आप लिख लेंगे। देखिए कमज़ोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले शुरुआत में पूर्ण तौर पर कला, या लेखन जैसे क्षेत्र में ना आएं, वैसे तो यह हमारे देश का ये दुर्भाग्य है कि अभी भी, हिंदी में खासकर फुल टाइम लेखक बनने के जिंदगी चला पाना और अच्छे से चला पाना मुश्किल है। नामुमकिन तो हम नहीं कहेंगे लेकिन इसके लिए बहुत जद्दोज़हद करनी पड़ती है। अगर आर्थिक पृष्ठभूमि कमज़ोर है तो शुरुआत में मैं सलाह नहीं देता की नौकरी के बिना आप लेखन करे। जब आपको लगे की कला और लेखन से भी पहचान बनने लगी है तब आप नौकरी छोड़ दें। प्लान-बी जरूरी होता है यानी फ्रस्ट्रेशन से बचना भी जरूरी होता है।

राजेश : सर, लेखन और कहानियां सुनाने के अलावा आप किन विषयों में रुचि रखते हैं?

हिमांशु :  मेरी रुचि कहानियां सुनाने में तो है ही है, लिखने में भी है ही है और मुझे क्रिकेट बहुत पसन्द है। क्रिकेट में जो हमारा दौर था, यानी नब्बे के दशक का क्रिकेट या अभी 2000 के दौर का जो क्रिकेट था (सचिन तेंदुलकर के दौर के बारे में) उसमें मेरी काफ़ी दिलचस्पी है। उसपे बात करना और लिखना पसंद है, हालाकि बहुत कुछ उसपे लिखा नहीं है लेकिन लिखेंगे ज़रूर! इसके अलावा हिस्ट्री में बहुत रुचि है खासकर अवध और इसके इर्दगिर्द के इतिहास में। नब्बे के दशक के संगीत में बहुत रुचि है, मोहम्मद रफ़ी साहब में रुचि है। इस तरह से ये तमाम विषय हैं, जिनमें मेरी रुचि है और मैं उनपर काम करना चाहता हूँ। कई सारी दास्तां लिखनी है। ट्रैवल में भी रुचि है लेकिन उस तरीके से नहीं जैसे कहते हैं कि आई वांट टू एक्सप्लोर या सोलो ट्रैवल। असल में, मुझे दोस्तों के साथ ट्रैवल करना पसन्द है। अगर दोस्त ना भी हो तो कोई अजीज़ इंसान जो मुझे समझता हो, उसके साथ यात्रा करना सुखद होता है।

राजेश : सर, आप क्षेत्रीय भाषा की स्थितियों को कैसे देखते हैं? आपको नहीं लगता, इनके लंबे सांस्कृतिक इतिहास की अनदेखी की जा रही है? जैसे मैं मगधी क्षेत्र से आता हूँ ऐसे में मैं कैसे हिंदी को मातृभाषा स्वीकार कर लूँ? आपने अभी हाल ही में माता जी के साथ अवधी में लाइव भी किया था।

हिमांशु : हाँ, बिल्कुल सही बात है। पहले, हम भी इसे सोचते नहीं थे। जैसा कि हमने बताया पहले ही कि चूंकि शहर में रहे, पले-बढ़े लेकिन गांव से हमारा ताल्लुक़ रहा है, पिताजी गांव में किसान रहे और हम गांव बहुत जाते रहे हैं। लेकिन चेतना जो बनी वह मूलतः शहरी चेतना बनी। इन चीजों को बहुत गंभीर तौर पर हमने काफ़ी समय तक नहीं सोचा। हमने कहा न, जब अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी आए जीवन में तो उन्होंने एक तरीक़े से रोशनी दी और चूंकि हम एक जिज्ञासु व्यक्ति हैं, पढ़ने लिखने में दिलचस्पी थी, संसाधन मौजूद थे, फिर हमने पढ़ा, समझा कि अमरेन्द्र भाई जैसे लोग कितना इंपॉर्टेंट काम कर रहे हैं।….बिल्कुल, आपने सही कहा कि सांस्कृतिक इतिहास की अनदेखी की जा रही है लेकिन हमेशा जानबूझकर नहीं की गई। जैसा हमने बताया ना आपको, मेरा कोई एजेंडा नहीं था, अवधी की अनदेखी करने की लेकिन रहे नहीं उस माहौल में, उसका महत्व बताया नहीं गया। घर में अवधी बोली जाती थी, लेकिन बच्चों पर ज़ोर था कि उन्हें खड़ी बोली सिखाई जाय, इंग्लिश सिखाई जाय। इसलिए अनजाने में हुआ। कई बार ऐसा होता है कि कोई व्यक्ति या घटना चाहिए होती है जो आपको किसी चीज़ का महत्व बताए। वो हुआ, हम समझते हैं, अब खासतौर पर अवधी को लेकर। भोजुपरी को लेकर तो काम हुआ है, भोजपुरी भाषी लोग कहीं भी होते है पूरे दुनिया में तो वो अपनी भाषा में बात करते हैं। अवधी को लेकर बहुत चेतना की जरूरत है, और आप अमरेन्द्र भाई से बात करेंगे तो वो एग्जैक्टली आपको अकादमिक तौर पर बता पाएंगे कि क्या करने की जरूरत है।

राजेश : सर, हर शहर का एक चरित्र होता है और व्यक्ति के निर्माण में उस चरित्र का अहम योगदान होता है? लखनऊ, बनारस (मैं ख़ुद बनारस में काफ़ी समय तक रहा हूँ), इलाहाबाद जैसे शहर, जो गंगा जमुनी तहजीब के वाहक रहे हैं उनका, आपके चरित्र निर्माण में किस प्रकार का योगदान रहा है?

हिमांशु : मेरी शख्सियत निर्माण में लखनऊ का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लखनऊ से अगर मेरा उस तरीके से जुड़ाव नहीं होता तो हम शायद ऐसे होते ही नहीं। मेरी चेतना का निर्माण ही इसकी बुनियाद पर हुआ है। लखनऊ शहर का बड़ा महत्व है, मेरी जिंदगी में। जो हम सोचते हैं, जो हमारा तरज़ें गुफ़्तगू, जो हमारी रविश है, जो हमारा अखलाक है, व्यवहार है वो लखनऊ से ही आता है। एक शहर आप पर इसी तरह से असर भी दिखाता है। सिर्फ लखनऊ की बात नहीं है, अगर बनारस में कोई रहा है और जुड़ा है उस शहर से संवेदना के स्तर पर तो बनारस उसकी शख्सियत में दिखेगा। जैसे-अमृत लाल नागर जी थे, इनके व्यक्तित्व में लखनऊ दिखता था। हमें लगता है कि लखनऊ बहुत अहम है, और उससे मोहब्बत भी है, उस मोहब्बत ने अलग तरीके से असर दिखाया। शहर से ग़ाफ़िल नहीं है, किसी को भी नहीं होना चाहिए। हर व्यक्ति को अपने शहर के बारे में चेतना होनी चाहिए, गफ़लत नहीं होनी चाहिए, खास तौर पर ऐसे शहर जिनके पास अपनी सांस्कृतिक विरासत है। उनके लिए तो ये काफ़ी महत्वपूर्ण है। …….ठीक है भाई, यही है, बाकी जो साथी हमको पढ़ रहे हैं सुन रहे हैं उनसे बस यही कहना है कि कोई भी काम जिसमें आपका जी लगता है उसमे लगे रहिए, वैसे हम ज्ञान देने में यकीन रखते नहीं, हर व्यक्ति का अपना तज़ुर्बा होता है। लेकिन एक चीज़ जो मुझे समझ में आयी वह यूनिवर्सल है, यह है कि अगर किसी चीज़ में मन लगता है तो लगे रहिए। ज़िन्दगी में सफलता किसी को जल्दी भी मिल जाता है, किसी को काफ़ी मेहनत के बाद, लेकिन अगर आप लगे हैं तो वो मेहनत जाया नहीं जाती है। कही ना कही उसका फायदा मिलता तो है। फ़ौरी तौर पर नहीं मिलेगा, लेकिन मिलेगा ज़रूर।