साक्षात्कार : एम. के. पांडेय

साक्षात्कार : एम. के. पांडेय

सोशियो लीगल लिटरेरी के इस इंटरव्यू सीरीज की पहली कड़ी में मंच के संस्थापक संपादक राजेश रंजन ने बात किया , भोजपुरी साहित्य के जानकार , लेखक, लल्लनटॉप कॉलमनिस्ट प्रोफेसर मुन्ना कुमार पाण्डेय से । प्रोफेसर पांडेय के लेख रंगमंच और सिनेमा विषय पर नटरंग, सामयिक मीमांसा, संवेद, सबलोग, बनास जन, परिंदे, जनसत्ता, प्रभात खबर जैसे पत्र-पत्रिकाओं में दर्जनों लेख/शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली सरकार द्वारा ‘हिन्दी प्रतिभा सम्मान(2007)’ से सम्मानित डॉ. पाण्डेय दिल्ली सरकार के मैथिली-भोजपुरी अकादमी के कार्यकारिणी सदस्य भी हैं. पढ़िए राजेश रंजन और आदरणीय एम के पांडेय सर के बातचीत को ।

राजेश : सर आपका परिचय और भोजपुरी भाषा से जुड़ाव पर आपकी टिप्पणी?

श्री पांडे- सहज शब्दों में , परिचय तो बस इतना है कि मैं अकादमिक इंसान हूं ,दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाता हूं , जहां तक आपका प्रश्न है भोजपुरी भाषा के जुड़ाव पर तो भिखारी ठाकुर पर मेरी पीएचडी रही है । स्कूलिंग तो नहीं पूछेंगे न ? ( दोनों हंसते हुए …..) राजेश का जवाब हंसते हुए नहीं सर ।

राजेश ; सर आप भोजपुरी भाषा को कैसे आंकते है ?

श्री पाण्डेय : देखिए इसको इस नज़रिए से देखिए बोली और भाषा का विवाद इसे किस तरीके से देख रही , भोजपुरी बोलने वाले लोगों पर हिंदी के प्रभाव को थोपा जा रहा है,जैसे आप मगधी क्षेत्र से आते हैं तो क्या आप स्वीकार करेंगे कि हिंदी आपकी मातृभाषा है? राजेश हस्तक्षेप उत्तर देते हुए नहीं सर । जारी रखते हुए श्री पाण्डेय , भोजपुरी के भाषा होने में कोई विवाद नहीं है ,ये भाषा है। लेकिन सारी लड़ाई हेजेमनी की है ,काफी पॉपुलर एक फ्रेज है जिसके पास थल ,वायु और जल सेना होती है वहीं बोली भाषा बन जाती है। भोजपुरी के खिलाफ एक तर्क ये भी है कि दूसरे जनपदी जो लोग इसे मातृभाषा नहीं स्वीकार कर रहे है अब्बल तो ये है कि उन्हें देशद्रोही तक कहा जा रहा है। हिंदी बचाओ मंच एक किताब है जिसमें प्रेमपाल शर्मा ने ऐसे लोगो को देशद्रोही कहा है । जो पूरी राष्ट्रवाद की परिभाषा है वो हिन्दू राष्ट्रवाद तक सीमित है। ये समावेशी नहीं है , भारतीय संदर्भ में भी ये राष्ट्रवाद नहीं है। अगर ये समावेशी होता तो भोजपुरी भाषा बोलने वालो को देशद्रोही नहीं कहता ? तब जब की द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर अबतक और आज़ादी के बात भी जब भाषाई आधार पर राज्य बने तो भोजपुरी भाषी ने कभी अलग राज्य की मांग नहीं की । साहित्यिक हलकों में देशविरोधी होने वाली बाते विद्दमान है। अस्मिता विमर्श में, भी जब हाशिए की जातियां केंद्र की जातियों पर हावी हो जाती है, उसका  सेहरा जो है भोजपुरी के सर पर बंधता है। देखिए न जो हीरो डोम कविता है वो किस भाषा में भोजपुरी में ही तो है। तो फिर ये बात कैसे है कि भोजपुरी भाषी राष्ट्र विरोधी हैं। कोंख के अधिकार, आप भिखारी ठाकुर को ही देख लीजिए।

राजेश : सर भोजपुरी के अश्लील संगीत पर उसका भोजपुरी की पहचान पर प्रभाव को कैसे देखते हैं आप ?

श्री पांडे:  अश्लीलता उतनी बड़ी समस्या नहीं है , क्यूंकि भोजपुरी की वैश्विक प्रसिद्धि इनसे नहीं बनी भोजपुरी की पहचान , जगदम्बा घर में दियरा बार आनु से हुई, अंगूरी में डस ले ली नगीनिया से हुई , आप देखिए न स्नेहलता गाती है मैथिली में, मशहूर भोजपुरी में हो जाती हैं, पद्म श्री विंध्वसिनी देवी को ही देखिए गाती मैथिली में है फेमस भोजपुरी में हो जाती हैं। तो ये शिफ्ट भी हमें देखने को मिला है। अभी नए दौर में आप चंदन और शैलेन्द्र को ही देखिए। एक गैप था, 2-3 लोगो के अलावा कोई बडा नाम नहीं था शारदा सिन्हा, बालेश्वर यादव , विरहा वाले , देखिए एरोटिक और वल्गर होने में धागे भर का फ़र्क है , कब इधर से पलटकर उधर हो जाते हैं पता नहीं चलता , ये जो भक्ति कैसेट की आड़ में ये उभार है न उसको आप इस नज़रिए से देखिए जो पलायित मजदूर है , और जो कोमल क्षणों को तलाश है उसको तृप्त किया ऐसे संगीत ने। एकाकी कामनाएं जब प्रबल होती थी तो युवा पहले , कलकत्ता जो पलायन करके जाते थे । राजेश बीच में हस्तक्षेप करते हुए..  सर लल्लन टॉप पर मैं संजय मिश्रा सर को सुन रहा था उनका नहीं मानना था कि पहले बिहार पर कलकत्ता हावी रहा था। श्री पांडे जारी रखते हुए

वो तो था ही सुमित सरकार ने भी लिखा है की उस समय पूर्व से आए लोगों की पूर्वी भाषा के लोगो की भीड़ कलकत्ता में जमा हो रही थी और ये लोग सोनागाछी की ओर गए ,लेकिन तकनीक ने इसे दूसरी ओर गमन किया , तो तातत्कालिक सुख के लिए एकाकी में भोजपुरी संगीत ने इसका स्थान ले लिया । आप देखिए न जो लोग ऐसे संगीत सुन रहे थे वो क्या अपने घरों में सुन रहे थे ? अपने घरों में वो लता मंगेशकर, किशोर कुमार और अमलोकर को सुन रहे थे । तो यह भोजपुरी संगीत के इस नए दौर के नैतिक विरोधाभास को भी दर्शाता है। क्या ऐसे लोग अपनी बहन ,मां या परिवार में सहजता से ऐसे संगीत को सुन सकते हैं ? नही न इसलिए अब आप देखिए कि अब भोजपुरी हलकों में यह स्वीकार्यता बढ़ी है कि भोजपुरी में अश्लील नहीं होना चाहिए। क्यों भाई आप तो मानते ही नहीं थे, इसका मतलब है कि आपने कुछ तो गलत किया होगा । ये इनकी पतन की शुरुआत है। तकनीक ने स्थायित्व रखा नहीं , जानकार और प्रबुद्ध लोग कहते हैं कि अगर आपको जल्दी लोकप्रियता पानी है तो हर चीज को आप सुपर लेटिव डिग्री में कहिए। यही इन संगीत ने किया है। एकाएक भोजपुरी का तेवर बदला हर दुल्हन पाकिस्तान से आने वाली जिस भोजपुर और भोजपुरी का कोइ रिश्ता नहीं पाकिस्तान से उसको इस तरीके से दिखाया गया और लड़की कह रही है कि हम ओकरे से ब्याह करब जेकर छतियां छप्पन इंच के होई?

राजेश : सर तो आप कहते है राजनीतिक बिंब से भी इसे जोड़ दिया गया.

श्री पांडे:    जी आप देखिए न।  इसका एक नुकसान ये हुआ कि एक पूरे समाज की सांस्कृतिक विरासत को धूमिल कर दिया गया, जैसे मॉम फिल्म को देखिए उसमे रेप करने से पहले एक्टर भोजपुरी गाना सुन रहा था । भोजपुरी के इस नैतिक विरोधाभास ने सांस्कृतिक अपराध को जन्म दिया।

आप समझिए आप गीत गा सकते हैं लोक गीत नहीं गा सकते हैं जो लोगो की थाती है उसे अपना बनाकर आप कैसे गा सकते हैं, भोजपुरी । महेंद्र मिश्र का एक गीत है जिसे मैंने लल्लन टॉप पर लिखा भी है , और मैंने राजेश्वरी शांडिल्य  जैसे नामचीन साहित्यकार का रेफरेंस लिया , उनके रचनावली का पहला उन्होंने इसे लिखा है मैंने 1983 के एक दस्तावेज का भी जिक्र किया है । एक भोजपुरी मुताई गीत है बताइए ये लोक गीत का कौन सा कैटेगिरी है ? लोगो के धरोहर को लोक रंजन की चीजों को अपना बताकर चला रहे हैं।  

जब हमने कल्पना पटवारी पर बोलना शुरू किया तो, बोलने का मतलब ये नहीं है कि उनसे जलन है या वो मेरे हिस्से की रोटी खा रही हैं। उन्होंने ने कहा कि ये लोग भिखारी ठाकुर को जानते ही नहीं थे वो तो मैं आई असम से और इन लोगो को बताया । इन्होंने ने एक और कहानी रची की भिखारी ठाकुर 100 साल पहले  मरे तो वो कौन थे जो 1971 में मरे ? इनसे पहले भोजपुरीमें भिखारी ठाकुर पर देवी ने गाया है तो ये पहली महिला कैसे हुई ? स्क्रॉल पर ये इंटरव्यू है। भोजपुरी में सांस्कृतिक प्रदूषण है, और हमने एक मौका दिया आलोचना का, नहीं तो हमारी संस्कृति बहुत समृद्ध रही है। जब आप ऐसे गायकों का बहिष्कार करते है तो जातीय संरचना से जोड़ दिया है, जो बिहार और उत्तरप्रदेश की समस्या है। हम जाति और दूसरे चीजों के नाम पर ये सांस्कृतिक अपराध कर रहे हैं। भाषा का प्रचार तो हो ही रहा है हम गिरमिटिया नस्ल के लोग हैं।

राजेश : सर हमारे राज्य से पलायन एक बहुत बड़ी समस्या रही है, वस्तुत: हम , आप सब पलायित वर्ग से ही आते हैं फिर भी बिहार सरकार के पास कोई रिकॉर्ड भी नहीं है ?

निश्चित तौर पर इसका एक रिकॉर्ड होना चाहिए , देखिए एक समस्या ये भी है न कि जो लोग बिहार से बाहर गए उन्मेसे जो पढ़े लिखे लोग है वो फिर लौटे है नहीं, तो अंतरराजयीय पलायन की सबसे बड़ी समस्या यही है। एक जो है शौखिया पलायन भी है, आप देखिएगा की गांव में लोग उसे सम्मान की नजर से देखते हैं, जैसे आप देखेंगे भिखारी ठाकुर के विदेशिया में नायक मजबूरी में कलकत्ता नहीं जाता है, ये उम्मीदों का शहर जब नायिका पूछती है – आपको किस बात का दुख़ है तो नायक कहता है कुछ दिन घूमकर लौट जाऊंगा और ये उम्मीद नायक के मित्र से आती है उसे।

राजेश : लेखन और अध्यापन के अलावा कोई और रुचि सर ?

श्री पांडे: हां बहुत पहले ट्रेकिंग करी थी , नीलताल और तपोवन गया था गढ़वाल क्षेत्र में 5200- 5300 मीटर की पहाड़िया हैं सब।

राजेश – मैंने लल्लनटॉप पर आपकी एक ब्लॉग पढ़ी है गढ़वाल क्षेत्र के एक राजा पर.

श्री पांडे- हां ये फ्रेडरिक विल्सन की कहानी है और इसे मैंने द राजा ऑफ हरसिल विल्सन रॉबर्ट हचसिन की किताब से साभार लिया है।

राजेश : शुक्रिया सर , सोशियो लीगल लिटरेरी के लिए समय निकालने के लिए, आभार एवं साधुवाद ।

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