साक्षात्कार : दलित विमर्श

साक्षात्कार : दलित विमर्श

सोशियो लीगल लिटरेरी के इंटरव्यू सीरीज के दूसरी कड़ी में आज हमारे साथ हैं दलित दस्तक के संपादक, अशोक दास जी। अशोक दास जी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन जेएनयू कैंपस से अपनी पढ़ाई पूरी की है। अपने 13 साल के पत्रकारिता के कैरियर में उन्होंने, अमर उजाला, लोकमत, जैसे अखबारों के लिए काम किया है। पढ़िए सोशियो लीगल लिटरेरी के संस्थापक संपादक राजेश रंजन से दलित विमर्श पर बातचीत। इस बातचीत को मॉडरेट करवाया है, अनुराग भास्कर ने। अनुराग जिंदल ग्लोबल लॉ स्कूल के फैकल्टी हैं एवं हार्वर्ड लॉ स्कूल के सेंटर फॉर लीगल प्रोफेशन के सहबद्घ फैकल्टी भी हैं। इस बातचीत में राजेश के सहयोगी रहे हैं सोशियो लीगल लिटरेरी के मैनेजिंग एडिटर, एवं संवाद प्रमुख कुंदन कुमार चौधरी।

1. राजेश : सर, एक सामान्य अर्थ लगाया जाता है कि दलितों के बारे में किया गया विचार ही दलित विमर्श है। आप दलित विमर्श को किस रूप में देखते हैं? खासकर जब हम आरक्षण की बात करते है तो गुणवत्ता जैसे प्रश्न खड़े कर दिए जाते हैं।

श्री अशोक दास : देखिए इसके बारे में बहुत पहले एक ठीक ठाक व्यक्ति ने लिखा है की प्रसव की पीड़ा को सिर्फ स्त्री समझती है कोई भी पुरुष इस पीड़ा को नहीं समझ सकता है । जहां तक बात दलित विमर्श की है तो इसको वही समझ सकता है जो इस समाज से जुड़ा हो या जिसने मानव विज्ञान, समाजशास्त्र, और मनुष्यता को समझा हो। जहां बात आरक्षण की है तो देखिए जब बात आर्थिक रूप से आरक्षण देने की आई तो इसे जो है विरोध से परे रखा गया है। समाज बिल्कुल खानों में बंट गया है, पूरे पॉवर स्ट्रक्चर एक साथ आ गए है,सारे लोग, मीडिया, ज्यूडिशियरी और यहां तक के इंटेलेक्चुअल भी एक तरीके से सोच रहे हैं। राजनीतिक शक्तियों ने यह मौका दिया है ये खुलकर सामने आ गया है

2. साहित्य में दलित विमर्श क्या है? आपके अनुसार दलित साहित्य क्या होना चाहिए और क्यों? (संदर्भ- दलितों द्वारा लिखित या दलितों पर लिखित)

श्री अशोक दास: मैं साहित्य का व्यक्ति नहीं हूं इसलिए साहित्य की बहुत बात नहीं कर पाऊंगा। आज के वक़्त में ठीक ठाक लोग हैं ,जिनको ठीक ठाक जगह दी गई है, जैसे, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम,ओमप्रकाश वाल्मीकि जी हैं, एवं महाराष्ट्र के बहुत सारे लोग हैं। हमें दलित साहित्य को एक स्वतंत्र आवाज़ देने की जरूरत है ,इसकी व्यक्तित्ता को धार देने की जरूरत है।

3. दलित साहित्य में तीन धारा मानी जाती है १. दलित जातियों में जन्में लेखकों की २. हिन्दू लेखक, जो ‘दलितों का चित्रण सौंदर्य सुख की विषय-वस्तु के रूप में करते हैं’ ३. प्रगतिशील लेखको का एक हिस्सा दलित को सर्वहारा की स्थिति में देखता है। आप इन तीनों धारा को क्या मानते हैं, या ये किस हद तक उचित है।

श्री अशोक: दलित साहित्य अभी बेहतर दौर में है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि प्रेमचंद की कहानियों में वो दर्द है । उन्होंने समझने का प्रयत्न किया है । कुछ और लेखकों ने न्याय किया है । पर बहुत हद तक इसे बदलने की जरूरत है। जैसे नामवर सिंह ने किसी दलित साहित्यकार को बड़ा कह दिया तो वो बड़ा साहित्यकार बन गया । नहीं उनकी अपनी एक अलग पहचान है । दलित साहित्य के अपने प्रश्न हैं ,और दलित साहित्य ने अपने जन विचार खड़े किए है उनको मिलाया न जाए।

4. सर लेखन, पत्रकारिता और सामाजिक सरोकार के अलावा कोई और रुचि?

श्री अशोक : मैं अपने रुचि की चीजे ही कर रहा हूं जो मैंने सोचा था।

5. सर लेखन एवं पत्रकारिता में आने वाले युवाओं के लिए सन्देश ? बहुत सारे लोग खासकर बिहार और उत्तरप्रदेश में अपनी रुचियों से समझौता कर लेते हैं? खासकर अभी के दौर में जहां मीडिया भी काफी चुनौतीपूर्ण दौर में है।

श्री अशोक: हर किसी की ज़िन्दगी में अलग अलग तरीके के संघर्ष होते हैं ।जिनको काम करना होता है वो कर लेते हैं जिनके पास विकल्प होते हैं वो विकल्प की तरफ मुड़ जाते हैं। मीडिया तो विकट स्थिति में है ही है , चुनौती भी है । लेकिन काम तो करना है।

राजेश,: सोशियो लीगल लिटरेरी से बात करने के लिए आभार सर एवं शुभकामनाएं।

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