साक्षात्कार : नवीन चौधरी

सोशियो लीगल लिटरेरी के इंटरव्यू सीरीज की चौथी कड़ी में मंच के मैनेजिंग एडिटर आर्यन आदित्य ने बात किया- ऑक्सफोर्ड इंडिया प्रेस के एसोसिएट मार्केटिंग डायरेक्टर, जनता स्टोर के लेखक, ब्लॉगर व ‘मार्केटिंग गुरु’ के नाम से विख्यात नवीन चौधरी जी से। ज्ञात हो कि नवीन चौधरी हमारे संपादकीय समिति का हिस्सा भी हैं।

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तो, पढ़िए इस दिलचस्प परिचर्चा को:

आर्यन : सर, समकालीन समय के परिप्रेक्ष्य में यदि बात करें तो युवाओं व साहित्य के मध्य सरोकार पहले से बदल चुके हैं क्योंकि जीवनशैली में अपेक्षाकृत गति आ गई है, बात-चीत में छोटे ‘कोट्स’ ज़्यादा पसंद किए जा रहे हैं और ऐसा माना जाता है कि साहित्य में अब युवा वर्ग रुचि नहीं ले रहा है, इसपर आप क्या कहना चाहेंगे?

नवीन : मैं पूर्णतः सहमत तो नहीं हूँ कि साहित्य में रुचि नहीं रही। रुचि बढ़ी है और लोग साहित्य पढ़ रहे हैं। जहाँ तक रही बात ‘कोट्स’ इस्तेमाल करने की तो हो सकता है, पहले भी ऐसा होता रहा हो क्योंकि आज की तरह उस दौरान सोशल मीडिया नहीं था। आज गूगल ट्रेंड्स हमें बता देते हैं कि लोग क्या पढ़ना चाहते हैं, क्या पसंद कर रहे हैं। दूसरा, फ़र्क़ यह है कि कोई भी नया पाठक जो युवा है, शुरुआत से ही गंभीर नहीं होता, गम्भीरता तो धीरे-धीरे आती है, इसलिए उसको जोड़ने के लिए कोई ऐसी कहानी सुना दीजिए जिससे वह अपने आप को जोड़ पाए जैसे हॉस्टल की बात या कोई प्रेम कहानी। फिर इस तरह की चार-पाँच किताबें पढ़ने के बाद उसे लगता है कि मैं इससे आगे बढूँ। इस तरह, पहला काम साहित्य से जोड़ना है, उसके बाद ही वे गम्भीर साहित्य (प्रेमचंद, रेणु, निर्मल वर्मा इत्यादि) की ओर उन्मुख होते हैं। दरअसल, यह भी एक ट्रेंड है हम उस ट्रेंड को शायद पूरी तरह से नोटिस नहीं करते पर यह मौजूद है इसलिए आप जब किसी भी प्रकाशक से पूछेंगे तो मालूम होगा कि ‘क्लासिक’ साहित्यिक रचनाओं की बिक्री में बढ़ोत्तरी हुई है। इस तरह समझिए कि क्लासिक किताबों की बिक्री किसने की है, इन्हीं नए पाठकों ने, जो बाद में मेच्योर हो गए। यह ट्रेंड न होता तो इन किताबों की बिक्री भी नहीं होती।

आर्यन : हिन्दी साहित्य को बाज़ार उपलब्ध कराने में ‘डिजिटल मार्केटिंग’ (फेसबुक इत्यादि) की क्या भूमिका है?

नवीन : मैं फेसबुक को काफ़ी श्रेय दूँगा। देखिए सबसे पहले तो प्रकाशन चाहे, चाहे हिंदी में अथवा अंग्रेज़ी में, बहुत कम मार्जिन देता है। एक-दो किताबों पर छूट वितरक को ज्यादा जाता है और आजकल तो ‘अमेज़न’ भी दाम निर्धारण करता है। ऐसे में, जो मार्जिन प्रकाशक बनाता है, उस हिसाब से 80 प्रतिशत किताबें भी नहीं बिकतीं जिससे वह अपना मूल्य ‘कवर’ कर सके। बाकी के 20 प्रतिशत से ही उनका पूरा पब्लिकेशन चल रहा होता है। जितनी भी किताबें पहले छप चुकी होती हैं (जैसे अगर मैं अपने प्रकाशक की बात करूं तो मेरे जैसे नए लेखक ‘कुछ’ राजस्व दे रहे होंगे) पर असल रेवेन्यू तो पहले छप चुकी किताबों से आता है। यही हमारा मॉडल है। ऐसी स्थिति में मार्केटिंग के पुराने ढर्रे (जैसे – अखबार में विज्ञापन देना, होर्डिंग इत्यादि लगाना संभव नहीं है) इसलिए हम सोशल मीडिया के माध्यम से ही ऐसा कर सकते हैं। न्यूज़पेपर रिव्यू भी मार्केटिंग का एक तरीका होता है पर उसकी एक सीमा है। आज अखबार ये बंद कर रहे हैं क्योंकि इससे उन्हें कोई आर्थिक लाभ नहीं होता। ऐसे में सोशल मीडिया मार्केटिंग में अहम भूमिका अदा करता है क्योंकि यहां आपके पाठक भी हैं और वे लोग भी, जो आपके पाठक नहीं हैं। दूसरा, अब लेखक के नज़रिए से देखिए तो मेरे लिए भी यह आसान हो गया है कि मै अपने घर में बैठे-बैठे कई पाठकों से बात कर सकता हूँ। नए लेखक इसका अच्छा उपयोग कर रहे हैं जैसे आपका फ़ोन आने से पहले मुझसे किसी ने पूछा- आप अपनी पढ़ी दस किताबों के विषय में बताइए। वे जब इसको प्रकाशित करेंगे तो जो पाठक मुझे पढ़ेंगे, वे सोचेंगे कि जिन्हें मैं पढ़ता हूँ, यह भी उनको पढ़ता है। इस प्रकार, यह मेरा प्रमोशन तो है ही; साथ में उन किताबों का भी, जो पाठकों ने नहीं पढ़ी हैं। हाँ, एक चीज जो मुझे लगती है, यह है कि सोशल मीडिया मार्केटिंग से सबको लगने लगा है कि वे लेखक हो सकते है लेकिन हर चीज़ के अपने प्लस-माइनस होते है, यहाँ प्लस ज़्यादा है। ( दोनों हँसते हुए )

आर्यन : सर, पाठकों में बड़ी संख्या उनकी भी है जो हिंदी पढ़ने में सक्षम नहीं हैं, ऐसे में ‘ऑडियो बुक्स’ मुहैया करा रहे ऐप्स की भूमिका को आप कैसे देखते हैं ?

नवीन : यह काफ़ी रोचक है। मेरी अपनी किताब भी ‘स्टोरी टेल’ पर है। मुझे याद है, जब मेरी किताब आई थी, उस दौरान मैं एक ऑर्गनाइज़ेशन के लोगों से मिला था, उनमें केरल की एक लड़की थी जो हिंदी समझती थी और बढ़िया बोलती भी थी। उसने नौकरी के दौरान हिंदी सीखी लेकिन उसके लिए हिंदी पढ़ना मुश्किल था। उसने मेरी किताब ऑडियो में सुनी। अच्छा, यह भी देखिए, ऐसे ऐप सिर्फ उन लोगो की मदद नहीं कर रहे जिन्हें भाषा पढ़ने में दिक्कत है बल्कि उनकी सहायता भी कर रहे हैं जो समयाभाव के कारण पढ़ नहीं पाते। जैसे-अपनी बात करूं तो मुझे खाना भी बनाना होता है। ऑफ़िस जाने के दौरान आमतौर पर हम पहले रेडियो सुनते थे। उसके बजाय अब एक किताब ख़त्म कर सकते हैं। तीन-चार घंटे में एक बड़ी किताब ख़त्म हो जाती है। इस माध्यम ने वह बहाने भी दूर कर दिया कि पढ़ने का समय नहीं है, आपके पास पढ़ने का समय नहीं है तो आप सुन सकते हैं।

आर्यन : सर, जब लेखन की बात आती है तो कहा जाता है- लेखन ऐसा होना चाहिए, जिसमें लोगों की अपेक्षाएं परिलक्षित होती हों। लेकिन, हालिया दौर में हिंदी और अंग्रेज़ी का मिला-जुला रूप (नई वाली हिंदी) में साहित्य परोसा जा रहा है, ऐसे में शुद्ध हिंदी ग़ायब होती जा रही है, यह कहाँ तक न्यायसंगत है? हालांकि इस सच से कोई इनकार नहीं है कि युवा वर्ग ने इसमें रुचि दिखाई है।

नवीन : देखिए, हिंदी को लेकर इस देश में एक धारणा बना दी गई है। अभी आपने जिस शब्द का इस्तेमाल किया-प्योर हिंदी। लेकिन समझिए कि शुद्ध हिंदी की परिभाषा समय के साथ बदलती जा रही है, इस बदलाव को आप पूरी तरह से नज़र अंदाज नहीं कर सकते, यह बदलाव उसका हिस्सा बनेगा। “अब ‘प्योर हिंदी’ जैसी कोई चीज नहीं है” क्योंकि हिंदी का कोई तय फॉर्मेट नहीं है, इसकी बोली परिवर्तित हो जाती है। एक ही शब्द को अलग-अलग जगह पर अलग तरीके से कहा जाता है। जैसे- पानी को मैथिली में (मैं मिथिला का रहने वाला हूँ) पईन कहते हैं। बिहार के अलग हिस्सों में कुछ और बोला जाता है। राजस्थान और पंजाब के कुछ इलाकों में उसे ‘पाणी’ कह देते हैं। कुछ लेखकों ने संस्कृत-निष्ठ हिंदी का प्रयोग किया उसे ही हमने शुद्ध मान लिया। उस समय ‘हिंदी-संस्कृत’ का मिश्रण था इस समय ‘हिंदी-इंग्लिश’ का मिश्रण है। मिश्रण ही चला आ रहा है, जैसे आप प्रेमचंद और रेणु को पढ़िए। रेणु बिहार से आए, प्रेमचंद उत्तरप्रदेश से, ‘आंचलिकता’ दोनों की भाषा की पहचान रही। उनकी भाषा को पढ़कर आज का कोई युवा जो ठीक-ठाक हिंदी जानता है, नहीं कह सकता कि उसे समझ नहीं आया। कुछेक शब्द हो सकते हैं, जैसे हमारे गांव में जहाँ चावल या अनाज रखते थे, कोठा कहलाता था।

आर्यन (बीच में टोकते हुए) : सर, हमारे नालंदा क्षेत्र की ओर उसके लिए ‘कोठी’ शब्द प्रचलन में है।

सर : अलग-अलग क्षेत्र में थोड़े बहुत परिवर्तन समझ आये हैं लेकिन आज के लेखन में कई बार हिंदी-इंग्लिश मिश्रण ज्यादा हो गया है, जो कि सीमा से ज्यादा है और यह नहीं होना चाहिए जबतक कहानी की ऐसी मांग न हो। जैसे- मेरी कहानी में अंग्रेज़ी के शब्द संवाद में हैं, जहाँ कोई स्कूल बोल रहा है तो मैंने सहज बनाए रखने के लिए ‘स्कूल’ शब्द का ही प्रयोग किया है, क्योंकि यही प्रचलित भी है। लेकिन पूरे तरीके से ये कह देना कि इसने हिंदी को बदल दिया है ऐसा नहीं होगा बाकी हर युग के अंदर ऐसा होगा कि एक वर्ग प्रचलित भाषा का इस्तेमाल और एक वर्ग पुराने ‘स्टाइल’ को लेकर चल रहा होता है और जो पुराना स्टाइल है वह समय के साथ बदलेगा भी। जैसे मैं भी कोशिश कर रहा हूं कि मैं पुराने स्टाइल को ‘कैरी ऑन’ करूं लेकिन पूरी तरह से नहीं।

आर्यन : सर आप मूल रूप से बिहार के हैं, लेकिन पले-बढ़े जयपुर में, अपनी इस यात्रा के बारे में बताइए। 

नवीन : जयपुर में पापा की जॉब थी, इसलिए हमलोग जयपुर आ गए। उस समय मैं पाँच साल का था। 2002 तक मैं जयपुर में रहा फिर एमबीए करने गया और उसके बाद नौकरी करते हुए नोएडा, भोपाल, चंडीगढ़ और दिल्ली में रहा।

आर्यन : सर, पॉलिटिक्स पर बात करना चाहेंगे। जनता स्टोर राजनीति के इर्द-गिर्द घूमती है। साथ ही यह भी बताइए कि आपको निजी स्तर पर राजनीति ने कैसे प्रभावित किया?

नवीन : सबसे पहली बात तो ये थी कि यूनिवर्सिटी में चुनाव लड़ने के दौरान मुझे एहसास हुआ कि मैं ‘बिहारी’ हूँ। उससे पहले कभी मुझे यह एहसास नहीं हुआ था क्योंकि उस दौरान मेरे खिलाफ़ बात चली कि मैं तो यहाँ का हूँ भी नहीं। यानि की विश्वविद्यालय की राजनीति में भी क्षेत्रवाद और जातिवाद अहम मुद्दे हैं। मेरा ये मानना है कि राजनीति आपकी ज़िन्दगी को हर रोज़ प्रभावित करती है। राजनीति में आपको रुचि न हो तब भी, राजनीति को आपमें रुचि है। अगर सरकार ने तय कर लिया की आयकर 30 प्रतिशत पर लेना है तो 30 प्रतिशत हमें देना है, हम फिर कुछ नहीं कर सकते, तो इस तरीके से राजनीति आपके जीवन का निर्धारण भी करती है। अगर राजनीति बदलनी है तो सबसे पहले हमें बदलना होगा। हम जैसा नेता चाहते हैं हमें वैसा बनना पड़ेगा। अभी नोट बंदी से पहले 3 प्रतिशत लोग आयकर देते थे, उसके बाद ये संख्या बढ़कर 5 प्रतिशत हो गई। लेकिन निश्चित तौर पर इस देश में बहुत सारे लोग टैक्स-चोरी कर रहे हैं और वो चाहते हैं कि उनका नेता ईमानदार हो। आपके बीच से ही तो नेता निकलता है। यकीन मानिए, अगर हम आज खुद को बदलना शुरू करेंगे तो 50-60 साल बाद खुद को ईमानदार व्यवस्था दे पाएंगे। 

आर्यन : सर, जनता स्टोर राजस्थान यूनिवर्सिटी के चुनावों पर आधारित है, लेकिन मेरा प्रश्न है कि दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य संस्थानों की राजनीति में क्या फर्क है? 

नवीन : राजनीति एक ही जैसी है बस कहानी राजस्थान की है तो आप वहाँ की जातियों के बारे में जान लेंगे लेकिन जातिवाद जैसा वहाँ है, वैसा ही दिल्ली में, गोरखपुर में भी है, पटना में भी और उतना ही इलाहाबाद में भी है। जातियाँ अलग हो सकती है लेकिन जातिवाद प्रबल है। राजनीति का दांव-पेंच इसी आधार पर चलता है कि जातियों का इस्तेमाल कैसे करना है। फंडिंग के लिए गुंडई कहाँ करनी है, इमोशंस को कैसे इस्तेमाल करना है। राजनीति का स्वरूप हर जगह एक ही है, बस स्थानीय चीजों के हिसाब से वह चेहरा बदल लेता है। कहीं का भी पाठक पढ़े उसे एक जैसा ही दिखेगा लेकिन दिल्ली के साथ यह है कि ‘केंद्र’ होने के कारण मीडिया कवरेज ज़्यादा मिल जाती है। यहाँ राष्ट्रीय पार्टियों के मुख्यालय होने के कारण उनपे नज़र ज्यादा जाती है। मुझे लगता है कि दिल्ली में बाकी जगहों के मुकाबले पैसा ज्यादा खर्च होता है, होता और जगहों पर भी है। जब मैं यूनिवर्सिटी में था तो एक छात्र संघ अध्यक्ष बने थे, जिन्होंने 100 गाड़ियों का काफिला निकाला था, तो शक्ति प्रदर्शन हमेशा से ही राजनीति का हिस्सा रहा है जो यहाँ दिल्ली में भी होता है।

आर्यन : सर, आपके अनुसार छात्र-राजनीति में मैनिफ़ेस्टो या जाति में ज़्यादा ‘से'(say) किसका है?

नवीन : शुरुआत तो मैनीफेस्टो से ही होती है लेकिन वोटर तो सब वही है घूम फिरकर बात जाति पर ही आती है आप अगर यूनिवर्सिटी में मैनीफेस्टो की बात करे तो बहुत सारे ऐसे छात्र होते हैं जिनका मुद्दा बड़ा अच्छा होता है, मीडिया में भी आ जाते हैं लेकिन चुनाव नहीं जीत पाते। जेएनयू जहां कहा जाता है वाम की विचारधारा काफी सशक्त है लेकिन ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो वामपंथी दक्षिणपंथी दोनों से असहमत होते हुए बीच का रास्ता निकालते है। जैसे जयंत कुमार जिज्ञासु जो जेएनयू में चुनाव लडा उसके मुद्दे अच्छे थे, पर अंत में विचारधारा की जीत हुई। जो जहां प्रबल है वो वहां जीत रहा है जहां जाति प्रबल है जाति, जहां विचारधारा प्रबल है वहां विचारधारा जीत रही है।

आर्यन : आजकल अच्छे पब्लिशर्स को अप्रोच कर पाना बड़ी समस्या है, विशेषकर उन लेखकों के लिए, जो नए हैं। वे लिख तो रहे है लेकिन कई बार लिखित सामग्री प्रेषित नहीं हो पाती। मेरा ही एक दोस्त प्रयास के बावजूद असफल रहा। इसे आप कैसे देखते हैं?

नवीन : यकीनन! अच्छे पब्लिशर पर काम का दबाव होता है। ऐसे में आपको यह देखना पड़ेगा कि आपकी कहानी में ऐसा क्या ख़ास हो, जिससे वह आपको प्रेषित करने के लिए चुने। एक और चीज यह है कि विंडो भी बहुत छोटी हो जाती है- जैसे 100 लोग हैं जिनमें 50 बहुत बड़े नाम हैं, 30 हमारे जैसे लोग हैं, जो आ गए तो आ गए। अगली बार प्रकाशक हमें तवज्जो देगा। बचे 10-15 स्लॉट में आपको यह देखना है कि आपकी कहानी प्रकाशक का ध्यान खींच पाए। प्रकाशक को यह समझना जरूरी है कि आपकी कहानी में बाजार के लिए नया क्या है। मुझे लगता है दुनिया में कोई भी ऐसी बात नहीं है जो न लिखी गई हो। किस तरीके से लिखी गई है, अंतर यहीं है। प्रेम कहानियां कबसे लिखी जा रही है लेकिन फिर भी अब तक टिकी हुई हैं क्योंकि कहने का तरीका अलग-अलग है। जैसे, मैंने अपनी किताब के लिए जब प्रकाशक को अप्रोच किया था तो यह कहा था कि छात्र राजनीति की ये ऐसी कहानी है जिसमें असल में राजनीति है, बाकी प्रेम कहानियों में सिमटकर रह गए थे। मैंने इस विशेषता के साथ अप्रोच किया था। दूसरी बात, आपको इंतेज़ार भी करना होता है, जैसे आपने कहानी भेजी तो एक से डेढ़ महीने का वक्त लेते हैं। आप फॉलो-अप करते रहिए पर वक्त तो देना होगा, आपने तुरंत भेजी और छप जाए, ऐसा तो नहीं होता। कुछ छोटे प्रकाशक हैं जो छाप देते हैं, उसमे भी दो तरह के लोग हैं-पहले वे जिन्हें आपकी कहानी पसंद आई हो और दूसरे वे, जिन्होंने पैसा लिया हो। ऐसे में आपको यह ध्यान रखना है कि वे आपके लिए क्या कर रहे हैं। फिर आप अपनी किताब बड़े प्रकाशकों को भी दे सकते हैं अगर उन्हें अच्छी लगी तो वे आपको अगले किसी प्रोजेक्ट के लिए हायर भी कर सकते हैं।

आर्यन : सर, सोशियो लीगल लिटरेरी के लिए आप कोई संदेश देना चाहेंगे?

नवीन : देखिए, लेखन की एक अच्छी बात यह है कि कंटेंट की गुणवत्ता समय के साथ बढ़ती है इसलिए अगर अभी ये भी लग रहा हो कि धीरे चल रहे हैं तो घबराना नहीं है। उसके कारण पहचानिए, सुधार कीजिए और ध्यान रहे इस दौरान कभी कंटेंट की क्वालिटी से कोई समझौता न हो। भीड़ बहुत है तो इसलिए आपको मार्केटिंग स्किल्स का प्रयोग भी करना होगा। 

आर्यन : शुक्रिया सर, आपसे बात करके काफ़ी अच्छा लगा। सोशियो लीगल लिटरेरी टीम की ओर से आपको बहुत सारी शुभकामनाएं।