साक्षात्कार : प्रतीक पचौरी

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सोशियो लीगल लिटरेरी के इंटरव्यू सीरीज की तीसरी कड़ी में, मंच के संस्थापक संपादक राजेश रंजन एवं मैनेजिंग एडिटर आर्यन आदित्य ने बात किया, उभरते हुए अभिनेता, निर्देशक, प्रतीक पचौरी से। हास्य को सहजता से परोसने में माहिर एवम् गांव, कस्बों और छोटे शहरों की कहानियों को रुपहले पर्दे पर रखने वाले प्रतीक ने, चौसर फिरंगी, पंचायत एवम् ऑपरेशन एमबीबीएस जैसे, फिल्मों एवम् वेब सीरीज में शानदार अभिनय से दर्शकों के बीच मुख्यधारा से अलग हटकर एक अलग पहचान स्थापित करने में कामयाब हुए हैं। पढ़िए इस बातचीत को.

राजेश : सर पंचायत से ही बात शुरू करते हैं, एक किरदार है जीतू भैया की जो शहरी मध्यमवर्गीय लड़के के द्वंद को दर्शाता है, फिर पंचायत सहायक चन्दन रॉय हैं, फिर आपका किरदार है बबलू की जो गांव में होने वाले आमतौर पर छोटे-छोटे झगड़ों को सजीवता से दिखाता है। आप स्वयं जबलपुर से आते हैं, मेरा प्रश्न ये है कि मनोरंजन जगत में गांव कस्बों एवं छोटे शहरों के स्पेस को कैसे देखते हैं आप ?

प्रतीक :   मैं इसको ऐसे देखता हूं कि क्योंकि मैं रंगमंच से जुड़ा रहा हूं, ( राजेश बीच में अगर मैं गलत नहीं हूं तो ‘अभिनय’ आपका अपना नाट्य मंच )  जी अभिनय मेरा अपना ही मंच है । तो छोटे शहरों और गांवों में लोग अभिनय की शुरुआत, शाहरुख, सलमान जैसे बड़े किरदारों से प्रेरित होकर करते हैं लेकिन जैसे ही आप रंगमंच से जुड़ते है तो आपको सबसे पहले अपने शहर और गांव को समझने को कहा जाता है जैसे मुझे सबसे पहले जबलपुर को समझने को कहा गया । तो जब मैंने श्री लाल शुक्ल, विनोद कुमार शुक्ल, विजय दंदाथे की कहानियों को पढ़ा तो हमने असली साहित्य को समझा । और आप ये भी देखिए की मुख्यधारा की सिनेमा भी इन साहित्यों को अपने तरीके से हायर करती या दूसरे रूप में कहूं तो उधार लेती है और वो उधार कभी चुकाती भी नहीं है वो । राजेश बीच में टोकते हुए की सर बात उधार से ज्यादा बढ़कर इस बात की भी है कि इन साहित्यों के साथ न्याय नहीं किया है इन्होंने। इसलिए पंचायत या आपकी पूरी टीम ने जो ऑपरेशन एमबीबीएस में काम किया वो इसलिए भी अलग है क्यूंकि इन्होंने भारत की आत्मा को एक जगह दिया इसलिए मुझे लगता की ये अब आपकी, प्रतीक पचौरी, संजय मिश्रा, पंकज त्रिपाठी जैसे किरदारों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वो इस धारा को आगे ले जाए ।

प्रतीक : जी बिल्कुल और अभी एक बताऊं जो कई कलाकारों की शिकायत रहती है कि प्लेटफॉर्म की कमी है, मैं अपनी बात नहीं कर रहा । लेकिन छोटे शहरों से जाने के बाद असली समस्या भाषा की होती है क्यूंकि आपको अंग्रेज़ी नहीं आती, लेकिन अभिनय आती है । मेरे कई सारे सीनियर्स जो मुंबई गए उनकी दिक्कत ये नहीं रही की वो बहुत ज्यादा मुंबईकर हो कर रह गए, जिस शहर या गांव से वो गए उसकी भाषा एवं संस्कृति को छोड़ दिया। लेकिन अब आप इधर हाल में देखे तो अचानक से गांव या कस्बों पर आधारित सीरियल्स का उभार हुआ, जैसे हप्पु सिंह नाम के किरदार को भाभी जी घर पर हैं उनमें आप देखे तो अचानक से बुन्देली भाषा, यूपी एवम् बिहारी भाषा एकदम से आकर्षित करने लगी लोगो को ।

राजेश : सर आप जो व्यक्तित्व संकट की जो बात कर रहे थे कि बहुत सारे लोग मुंबईकर होकर रह गए उस पर आप थोड़ा प्रकाश डालें।

प्रतीक :  देखिए इसको मैं ऐसे भी देखता हूं कि जब आप पहली बार मुंबई जाते हैं तो आप एक सांस्कृतिक संकट से गुजर रहे होते हैं। आपको कहा जाता है आप कॉन्टैक्ट्स बनाए, बोली भाषा, पहनावे को बेहतर करें, तो इसमें क्या होता है न की कभी कभी आदमी खुद को नकली महसूस करने लगता है । अभिनय कौशल सबसे अंतिम चीज होती है जिस पर बात की जाती है । पर बहुत सारी सकारत्मक चीजे हैं जैसे आप चन्दन रॉय को ही ले लीजिए, दीपक मिश्रा जो निर्देशक हैं पंचायत ये इतने देशी लोग हैं कि लगता है यही पंचायत है । आप दक्षिण के सिनेमा को देखिए उनका मेकिंग, कहानियां ये सारी इतनी अच्छी होती है मुख्यधारा कि सिनेमा को उनसे सीखने की जरूरत है । हमने एक फिल्म बनाई थी चौसर फिरंगी, इसके सारे कलाकार मध्यप्रदेश के थे, तो ये फिल्म जब मुंबई गई तो इसे क्षेत्रीय सिनेमा कहा गया । राजेश : सर एक चीज ये भी है न कि हम अपनी संस्कृति को ऐसे देखते हैं जैसे अपराध कर रहे हैं लेकिन जब आप बाहर की संस्कृति को देखे तो वो इस पर गर्व करते हैं । हम कला को जो खंडो में बाटकर नहीं देखना चाहिए, कला को कला के तौर पर देखना चाहिए,चाहे तो उसकी आलोचना करे लेकिन फिल्म किसी भी क्षेत्र को हो वो कला की नज़रों से ही देखी जानी चाहिए।

राजेश : सर आपने चौसर फिरंगी, सोनी जैसे फिल्मों में काम किया है आपको क्या लगता है कि जो कलाकार अभिनय को जीते हैं, आपके जैसे बहुतेरे कलाकार, आप मनोरंजन जगत में इस यात्रा को कैसे देखते हैं ?

प्रतीक :  मैं इस यात्रा को ऐसे देखता हूं कि एक जगह मैंने पढ़ा था कहानी उसी की लंबी होती है जिसकी यात्रा लंबी होती है, और रोचक भी । मैं इसको बहुत मजेदार मानता हूं  मैं इसको वैसे नहीं देखता हूं, हां एक चीज था की जब थियेटर करना शुरू किया था, तो मम्मी, पापा, दोस्तों ने विरोध किया था और सब लोग कह रहे थे कि नौकरी कर लो, मैं भी एक समय मान चुका था कि नौकरी ही करनी पड़ेगी लेकिन जो बाद में जो इनर कॉलिंग रहती है तो आपको लगता है आपको यही काम करना चाहिए। उन सबको करते हुए काफी डर रहता था कि पैसे नहीं है थियेटर में और एक्चुअली काफी डराया भी जाता था कि कितने लोग मुंबई गए, कुछ नहीं हुआ पैसे नहीं रहेंगे । लेकिन आप जब उनके बारे में सोचना बंद करके जब अपने बारे में सोचते हो कि आपको ये काम करना अच्छा लगता है तो आपको सच में मजा आने लगता है। और ये पूरी यात्रा काफी दिलचस्प है, और ये काम का हिस्सा भी है इसको ऐसे ही देखना चाहिए। मैं जब आरंभ में मुंबई गया था तो नौ लोगो के साथ रहता था और नौ लोगो के खाने बनते थे, हंसी मजाक, लड़ाई झगड़े, तो काफी ये रोचक यात्रा होती है । और ज्यादातर लोग आपके अपने क्षेत्र से होते है तो आपको अपनी औकात भी बताए रखते हैं , ताकि ज्यादा आप चौड़े न हो जाए, और आप जमीन से जुड़े होते हैं।

राजेश : सर आप फिल्म मेकिंग, पंचायत से जुड़ाव इन सबके बारे में बताएं?

प्रतीक :  जी मैं शुरुआत चौसर फिरंगी से करता हूं, चौसर फिरंगी की शुरुआत तब हुई जब हमलोग थियेटर कर रहे थे, संदीप पाण्डेय जो इसके निर्देशक और लेखक भी हैं। मैं एमपी स्कूल ऑफ ड्रामा से आया था और ‘अभिनय’ के जरिए जिसका मैं सचिव हूं और संदीप अध्यक्ष हैं हमलोग थियेटर कर रहे थे, तभी उन्होंने एक शॉर्ट फिल्म के लिए स्टोरी लिखी थी चौसर फिरंगी की, जिसमे मैंने एक्टिंग नहीं की थी और लोगो ने किया था, जिसके बाद ये मन में इच्छा जागी की हम इसको बड़े फिल्म के जैसे बनाते हैं कम बजट में ही बनाएंगे, अपने शहर के लोगों को ही दिखाएंगे लेकिन बनाएंगे जरूर । फिर हमने प्रोसेस शुरू किया बनाने का लेकिन इसमें सबसे बड़ी समस्या थी फाइनेंसर की । जो पैसे लगाएगा वो रिटर्न की भी सोचेगा। हमने आमदनी के लिए लोकल थिएटर से भी बात किया की कैसे लोगो से कमाकर प्रोड्यूसर को दे सकते हैं, क्राउडफंडिंग भी कर रहे थे, घर घर जाकर चंदा मांग रहे थे । हम 200-500 रुपए इक्कट्ठे करते थे और ये काफी मुश्किल काम था, लोग इसको इस नजर से देखते थे कि हम ये क्यों कर रहे थे फिर हमने उनको समझाया की भीख नहीं है हम फिल्म बना रहे हैं तो लोगो ने कहा कि पहले कमाओ फिर बना लो फिल्म। ये पूरी कहानी है 4 साल में ये फिल्म बनी है । तो फिर एक फाइनेंसर मिले जिनका शेयर मार्केट में बिजनेस था, उन्होंने हमें अपनी ऑफिस दे दी हमने ऑडिशन करके कास्ट भी कर लिया, लेकिन फिर एक दिन हमलोग पैसे के लिए गए तो वो हमें एक बार में ले गए और अपने दोस्तो में सामने कहा की ये लोग फिल्म बनाना चाहते हैं चंदे दे दो । ये हम लोगो को काफी अजीब लगा और हमे लगा कि हमारे साथ मजाक हो गया है इतने दिन में बहुत बड़ा । हमें गुस्सा भी आया, और लगा कि हमें बेवकूफ समझ लिया है क्या समझ लिया है, और समय भी बर्बाद कर दिया । कुछ दिन के लिए हमने आइडिया ड्रॉप कर दिया और उस दिन से उस आदमी से ही मिलना बन्द कर दिया क्यूंकि हमें झटका लगा, क्योंकि 15-20 दिन से हम लोगो से कह रहा था पैसे है और फिर एकदम से ये सब । फिर हमलोग एक बिल्डर से मिले सिद्धार्थ यादव जो बाद में प्रोड्यूसर भी बने इस फिल्म के। वो फिल्म जगत से तो नहीं थे लेकिन उनकी रुचि जरूर थी । हमलोग मिले और उनको बताया कि दस लाख रुपए ही हमारा बजट है तो उन्होंने कहा ठीक है बनाते हैं फिर उनके एक दोस्त हैं जो मीडिया में हैं उनको इन्होंने बताया हमारे बारे में और फिल्म की स्क्रिप्ट हमने उनको भी भेजा उन्होंने सलाह दी बजट बढ़ाने की फिर बजट बढ़ाई। फिर हमने एफटीआई के एक ग्रेजुएट को डायरेक्टर ऑफ फोटोग्राफी बनाया। शूटिंग शुरू हुई लेकिन 5 दिन में बंद करना पड़ा क्यूंकि हमारे प्रोड्यूसर के घर पर कुछ आर्थिक दिक्कत आ गई । फिर हमलोग मायूस हो गए 1 से डेढ़ साल हो गए थे ऐसे करते करते । फिर एक दिन सिद्धार्थ जी का खुद से फोन आया और हमने रीप्लान करके शुरू किया शूटिंग । 2017 में पहली बार हमने शुरू किया था शूटिंग । हमारे प्रोड्यूसर इन्द्र कुमार जी को लेना चाहते थे, स्टार वैल्यू की वजह से, लेकिन फिर इन्द्र कुमार जी की मृत्यु हो गई मुंबई में । तो फिर एक और एक्टर लेकर शेड्यूल हुआ शूटिंग । छोटे शहर में फिर शूटिंग करने के कारण दिक्कत हुई कोई भी आकर शूटिंग रोक दिया, कोई शराब पीकर आकर शूटिंग रोक दिया। कभी पुलिस वाले आकर शूटिंग रोक दिया करते की जबकि हमारे पास कलेक्टर का परमिशन था, पर वो कहते वो सब तो ठीक है तुमने हमारे थाने से परमिशन क्यों नहीं लिया? फिर रिश्वत देकर हमलोग शूटिंग करते । हम लोगो ने किराए का हॉल लेकर रखा था, हमलोग घर नहीं जाते थे, रात को शूटिंग करते थे और फिर सुबह उसी हॉल में जाकर हमलोग अंडे खाकर सो जाया करते थे और रात को फिर से शूटिंग करते थे । उसके बाद 3 शेड्यूल डेढ़ साल में शूटिंग ख़तम हुई। फिर हमलोग पोस्ट के काम के लिए मुंबई गए, तो बड़ी मुश्किल से एक एडिटर मिले, उनका ये कहना था कि हम डायरेक्टर को नहीं बैठाएंगे एडिटिंग के दौरान । इधर डायरेक्टर ने मेहनत कि थी वो कह रहे थे कम से कम बैठा तो लो। फिर जब उन्होंने एडिट किया तो डायरेक्टर को लगा कि कहानी के हिसाब से ये नहीं है, एडिटर को लगता कि तुम लोग छोटे शहर से आए हो तुम हमें सीखाओगे। फिर निर्देशक के एक दोस्त ने एडिटिंग करी और फिर एक एफटीआई के जिम्मी थे उन्होंने साउंड किया, उन्होंने स्वयं कहा की मैं साउंड करना चाहूंगा उन्होंने फिल्म देखी उन्हें अच्छा लगा जिसके बाद उन्होंने ये इच्छा जताई।

राजेश :  कितनी अच्छी बात है न सर की एक तरफ आपको ऐसे भी लोग मिले जो आपकी मदद कर रहे थे एक तरफ ऐसे भी लोग मिले जो आपके काम में बाधा डाल रहे थे तो जीवन की विविधता का ये एक जीवंत उदाहरण भी है।

प्रतीक :  जी ये तो है ही और फिर बाद में जब ये फिल्म अमेजन प्राइम पर पहुंची तो वो लोग भी इसके क्रेडिट मांगने लगे।

राजेश :  सर एक बात है न कि सफलता जो है भीड़ में आती है असफलता इंसान को अकेला कर जाती है, आपकी पूरी कहानी इस वाक्य को चरितार्थ करती हुई नज़र आती है।

प्रतीक :   ये तो है ही और ‘चौसर फिरंगी’ की अच्छी बात ये रही न की इसने हमें फिल्म मेकिंग के एक एक पहलुओं से रूबरू करवाया। हम टॉकीज में फिल्म देखते हैं और बहुत जल्दी अपना मत दे देते हैं पर पहली बार हमने इसकी बारीकियों को समझा। फिर फिल्म बनने की बाद डिस्ट्रीब्यूटर ने बहुत बड़ा फ्रॉड किया है  उन्होनें पोस्टर, बैनर और स्क्रीनिंग के 15 लाख रुपए ले लिए फिल्म  5 अप्रैल को रिलीज होनी थी पर उन्होंने रिलीज नहीं किया । हमलोग ने इससे पहले काफी प्रचार कर दिया था हाथ जोड़ जोडकर हमने इसके बारे में लोगो को बता रखा था । लेकिन 4 तारीख को डिस्ट्रीब्यूटर ने फोन करके बताया कि फिल्म यूफओ पर अपलोड नहीं हुई है । हमलोग काफी निराश हो चुके थे क्यूंकि फिल्म अगले दिन रिलीज नहीं होने वाली थी और हमने काफी प्रचार किया था, फिर उस दिन हमलोग निराश होकर गौरी घाट करके एक जगह वही पूरी रात बैठे रहे। हमलोग ये सोच चुके थे कि इस देश में एक आम आदमी फिल्म नहीं बना सकता, और बना भी दे तो वो रिलीज नहीं कर पायेगा। फिर वो दिन गुजरा 5 अप्रैल का दिन गुजरा 6-7 तारीख को डिस्ट्रीब्यूटर के पास हमारे प्रोड्यूसर सिद्धार्थ जी गए उन्होंने वहां देखा कि कोई फ्लैक्स तक नहीं छपवाया है फिर उन्होंने पूछा कि पैसे जब आपको पहले दे दिए तो आपने यूएफओ पर अपलोड क्यों नहीं किया ? डिस्ट्रीब्यूटर ने कहा कि उसके अलग से साढ़े चार लाख रुपए लगते हैं। तो सिद्धार्थ ने कहा कि हम आपके खिलाफ केस करेंगे उनका जवाब था कि ये हमारा खानदानी पेशा है आप कर लीजिए ऐसे छोटी फिल्में आती है और जाती है, हमने वो 15 लाख इन्वेस्ट कर दिए, लेकिन अगर आप साढ़े 4 लाख रुपए देते हैं तो हम रिलीज कर देंगे, हमने स्क्रीन वालो से बात कर रखी है । फिर सिद्धार्थ के जो भोपाल के मित्र रहे उन्होंने बात किया और जी म्यूजिक ने फिर कॉलाबोरेट किया जिससे फिल्म में वजन आ गया, जी ने अपने चैनल से इसे लॉन्च किया । फिर डिस्ट्रीब्यूटर को हमने 4 लाख तो नहीं 3 लाख ही देकर इसको 25 स्क्रीन पर लॉन्च किया। फिर उन लोगो ने इसमें चीटिंग ये करी की हमने जिन शहरों में उन्हें लगाने कहा उन्होंने वहां नहीं लगाया। फिर ये फिल्म अमेजन तक गई । फिर कई लोगो ने इसे अमेरिका में देखा और सराहा। और फिर पंचायत से मैं ऐसे जुड़ा की, हमारे एसोसिएट डायरेक्टर अभिजीत परमार ने मेरी फिल्म देखी थी चौसर उन्होंने ही बताया कि टीवीएफ कोई सीरीज बना रहा है गांव के ऊपर, उस समय नाम नहीं पता था कि पंचायत था । तो ऐसे ही रोज की भांति हम ऑडिशन के लिए गए थे, उस दिन हम अपनी ऑडिशन के लिए नहीं, एक दोस्त था नया नया मुंबई आया था उसकी ऑडिशन के लिए । ‘कास्टिंग बे’ में ऑडिशन चल रहा था फिर हमने ऑडिशन दिया, पहला ऑडिशन हमने दूल्हे वाले किरदार के लिए दिया, लेकिन उन्हें अच्छा नहीं लगा, पहले पंचायत की 5 एपिसोड ही शूट होनी थी । फिर हमारे पास कास्टिंग बे से मैसेज आया, बबलू, डबलू के किरदार को लेकर, तो हमने कहा हम जबलपुर में हैं ऑडिशन के लिए आ नहीं सकते । फिर मैंने फोन किया उन्हें बाद में और बोला मैं वीडियो रिकॉर्ड करके भेज देता हूं उन्होंने कहा ठीक है भेज दो पर मैं भरोसा नहीं दे सकता की तुम कास्ट हो जाओगे । हमने वीडियो बनाकर टीवीएफ को भेजा, और फिर उनके डायरेक्टर को ये पसंद आ गया और मैं कास्ट हो गया। सर अब आप से आर्यन बात करेंगे ऑपरेशन एमबीबीएस, पर ये आपके फैन भी हैं (सभी हसते हुए)

आर्यन : सर ऑपरेशन एमबीबीएस देखा, कितना मुश्किल रहा आपके लिए एक लगातार फेल होने वाले मेडिकल छात्र के रूप में किरदार निभाना? क्यूंकि आप नॉन मेडिकल पृष्ठभूमि से आते हैं।

प्रतीक :   मुझे लगता कि अभिनय में जिस प्रोफेशन को आप निभाते हैं उसकी बारीकियों से अवगत होना बहुत जरूरी है। मुझे पहले पता नहीं था कि मुझे मेडिकल छात्र के रूप में किरदार निभाना है, मुझे सिर्फ इतना पता था कि मुझे एक कॉलेज छात्र की भूमिका निभानी है जो चार साल से फेल हो रहा है। लेकिन जब मुझे मेडिकल छात्र के किरदार के बारे में पता चला तो मैं जबलपुर मेडिकल कॉलेज गया, लोगो से बात किया उनके शब्दावली सीखे, रैगिंग के तरीके के बारे में जाना, वो क्लास नहीं जाते, उनके अलग फंडे होते हैं । हम डार्क साइड नहीं जा रहे एमबीबीएस के हम सिर्फ कॉमेडी को ही रख रहे । लेकिन जब हमने ये समझा की वो फेल अंग्रेज़ी और एनाटॉमी की वजह से होते हैं। क्योंकि एनाटॉमी में चीजे याद रखनी होती है ।

आर्यन : सर आप अभियांत्रिकी कॉलेज से पढ़ाई की है कैसा रहा आपका अनुभव वहाँ ?

प्रतीक :  जी अच्छा था, हर कॉलेज की तरह हमारे कॉलेज भी के सी त्यागी टाइप लड़के थे । एक दोस्त था हमारा रॉबिंसन वो हिंदी मीडियम स्कूल से आया था, अंग्रेज़ी आती नहीं थी, पहले क्लासमेट था, लेकिन बाद में पीछे हो गया। ऐसे अनुभव मेरे पास पहले से थे तो किरदार निभाने में आसानी हुई । बाद में मैं थियेटर भी शुरू कर दिया था, फेस्ट के आयोजक भी रहा, तो कॉलेज बड़ा दिलचस्प रहा मेरा।

आर्यन : मुझे एक चीज बड़ी यूनीक  लगी की आप फेल हो रहे हैं फिर भी आपको सब सर ही बुला रहे हैं। ये तो है की इज्जत कम नहीं होती।

तीनो साथ में जी हर कॉलेज की ये बात होती है।

राजेश : पता नहीं सर भविष्य की बात करना कितना सही है फिर भी आप मुझे बताइए कि आगे क्या योजना है।

प्रतीक : अभी तो एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी लॉकडाउन की वजह से रुकी हुई है। शेरनी फिल्म है विद्या बालन और विजय राज हैं मुख्य भूमिका में।

राजेश : तब सर अभी मुंबई जाना है या रहना है घर बंदी के बाद क्या प्लान हैं।

प्रतीक :  जी अभी तो यही रहूंगा भोपाल में शूटिंग होनी है फिल्म की ।

राजेश : जाते जाते यही कहना चाहूंगा सर की बहुत उम्मीदें है आपसे, और जल्द ही मिलूंगा आपसे पेड़े के साथ, शुक्रिया सोशियो लीगल लिटरेरी और हमसे बात करने के लिए।

प्रतीक : खिलखिलाते हुए जी जरूर, आपको भी शुक्रिया ।