गीत चतुर्वेदी से गायत्री की बातचीत

अंवा-गार्द एक फ्रेंच शब्द है, जो आमतौर पर पुराने ज़माने में सेना की टुकड़ी का नेतृत्व करने वाले सिपाही या सेनापति के लिए इस्तेमाल किया जाता था। बाद में कला की दुनिया में उन लोगों को परिभाषित करने में प्रयुक्त होता था, जो नवीन प्रयोग करते थे, कलात्मक प्रयोगधर्मिता की अग्र पंक्ति में खड़े होते थे, रूढ़िवादी नहीं थे। जहाँ तक मेरी बात है, कई बार मालूम भी नहीं चलता या देर से पता चलता है कि आपके बारे में ऐसा कोई शब्द या विशेषण- जैसा कुछ प्रयोग किया जा रहा है। ऐसे शब्द या उपाधि या विशेषण पढ़ने-सुनने में कई बार अच्छे लगते हैं, बाज़ दफ़ा अच्छा भी महसूस होता है, लेकिन समग्रता में मैं इन सब से प्रभावित नहीं हो पाता। मैं अपने काम को अधिक देखता हूँ, नाम और उपाधियों को कम।

Read more →

साक्षात्कार : एम. के. पांडेय

सोशियो लीगल लिटरेरी के इस इंटरव्यू सीरीज की पहली कड़ी में मंच के संस्थापक संपादक राजेश रंजन ने बात किया , भोजपुरी साहित्य के जानकार , लेखक, लल्लनटॉप कॉलमनिस्ट प्रोफेसर मुन्ना कुमार पाण्डेय से।

Read more →