संविधान संवाद – तरुणाभ खेतान

होस्ट : सुरभि करवा; राजेश रंजन

संविधान संवाद का उद्देश्य संवैधानिक साक्षरता को बढ़ाना और भारतीय संविधान की पहुँच को व्यापक बनाना है । इस संवाद के तहत हम प्रोफेसर तरुणाभ खेतान (प्रोफेसर ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय एवं मेलबर्न विश्वविद्यालय) के साथ संविधान और संवैधानिक थ्योरी के विभिन्न विषयों पर हिंदी में चर्चा करते हैं। इस सीरीज के होस्ट सुरभि करवा और राजेश रंजन हैं. सुरभि विधि शोधार्थी हैं और संविधान और जेंडर के मुद्दों पर लिखती है और राजेश कानून के छात्र हैं और सोशियो-लीगल-लिटरेरी के संस्थापक है। यह संवाद लाइव लॉ और सोशियो-लीगल-लिटरेरी की साझी पहल है ।

एपिसोड – 8 लोकतंत्र उसकी प्रणाली एवम् विपक्षी अधिकार

संविधान संवाद का “आठवां” एपिसोड लोकतंत्र उसकी प्रणाली एवम् विपक्षी अधिकारों पर केन्द्रित है। संसदीय लोकतंत्र क्या, राष्ट्रपति प्रणाली क्या है, क्या लोकतंत्र में सत्ता पक्ष ही सबकुछ है? ऐसे सभी सवालों की पड़ताल करता यह वीडियो।


रीडिंग लिंक – https://privpapers.ssrn.com/sol3/papers.cfm?abstract_id=3762507
पिछ्ले सभी संवाद का वीडियो लिंक – https://www.sociolegalliterary.in/samvidhan-samvad-with-tarunabh-khaitan/
पिछले सभी संवाद का ऑडियो लिंक- https://anchor.fm/sociolegalliterary

एपिसोड – 7 (भाग-2) “नागरिकता” के सिद्धांत

संविधान संवाद का सातवां एपिसोड “नागरिकता” के सिद्धांत पर केन्द्रित है। इसके दूसरे भाग में हमने भारत में हुए नागरिकता आंदोलन, एवम् नागरिक कानूनों में हुए संशोधनों पर चर्चा की है। हमने राष्ट्रवाद और नागरिकता के मुद्दे पर भी विमर्श किया है एवम् टैगोर के नजरिए को भी समझने की कोशिश की है।
रीडिंग लिंक –

रीडिंग लिंक – 1 – “Kanika Gauba: Forgetting Partition”

रीडिंग लिंक – 2 – “Niraja Gopal Jayal: Faith-based Citizenship”

रीडिंग लिंक – 3 – “Niraja Gopal Jayal, Citizenship and its Discontents: An Indian History”

एपिसोड – 7 (भाग-1) “नागरिकता” के सिद्धांत

संविधान संवाद का सातवां एपिसोड “नागरिकता” के सिद्धांत पर केन्द्रित है। इसके पहले भाग में हमने नागरिक, कौन है? नागरिकता का सिद्धांत क्या हैं? इसे कैसे परिभाषित किया जा सकता है? एवम् संविधान बनने के दौरान बंटवारे के बाद की स्थिति में नागरिकता के सिद्धांत को कैसे परिभाषित किया गया। इस पर विस्तार से बातचीत की है।
रीडिंग लिंक –

रीडिंग लिंक – 1 – “Kanika Gauba: Forgetting Partition”

रीडिंग लिंक – 2 – “Niraja Gopal Jayal: Faith-based Citizenship”

रीडिंग लिंक – 3 – “Niraja Gopal Jayal, Citizenship and its Discontents: An Indian History”

एपिसोड – 6 सत्ता विभाजन का सिद्धांत

संविधान संवाद का छठा एपिसोड “सत्ता विभाजन” के सिद्धांत पर केन्द्रित है। सत्ता के अलग-अलग अंग जैसे कार्यपालिका, विधायिका एवम् न्यायपालिका के बीच सत्ता का विभाजन क्यों जरूरी है, एवम् लोकतंत्र और प्रशासन में इस सिद्धांत की क्या भूमिका है- ऐसे ही सवालों की पड़ताल करता यह वीडियो।

रीडिंग लिंक – “Jeremy Waldron: Separation of Powers in Thought and Practice”

एपिसोड – 5 उदारवाद

संविधान संवाद की पांचवीं कड़ी “उदारवाद” के सिद्धातों पर केन्द्रित है। उदारवाद और संविधानवाद का संबंध क्या हैं? दार्शनिक उदारवाद क्या संविधानिक उदारवाद में बदल पाया है? निजी संपत्ति एवम् स्वतंत्रता का उदारवाद से क्या रिश्ता है। जानिए इस वीडियो में।
रीडिंग लिंक – 1. “Massimo Fichera: Liberalism
रीडिंग लिंक – 2. “Gerald Gaus et al: Liberalism”

रीडिंग लिंक – 3 – “Dinyar Patel’s book on Naroji

एपिसोड – 4 लोकतंत्र

संविधान संवाद की इस कड़ी में हमने लोकतंत्र पर बातचीत की। क्या लोकतंत्र केवल चुनावों से बनता है? लोकतंत्र आख़िर है क्या? और यह क्यों ज़रूरी है? क्या एक जनता के पास लोकतान्त्रिक चुनावों में तानाशाही सरकार चुनने का हक़ है? समझिये इस कड़ी में।

रीडिंग लिंक – 1. Andrei Marmor : Are Constitutions Legitimate?

रीडिंग लिंक – 2. Ornit Shani : How India Became Democratic

एपिसोड – 3 कानूनी शासन का सिद्धांत

संविधान संवाद का तीसरा एपिसोड rule of law (कानून के शासन) पर केंद्रित है। कानून के शासन और जंगल राज में क्या अंतर है? कानूनी शासन और किसी राजा/तानाशाह के शासन से कैसे भिन्न है तथा कानूनी शासन संविधानवाद के लिए अनिवार्य क्यों है- इस कड़ी में इन सवालों पर चर्चा की गयी है. 

रीडिंग लिंक – Joseph Raz : The Law’s Own Virtue

एपिसोड – 2 वैचारिक विरोधियों से समझौतों का महत्व

संविधान संवाद की दूसरी कड़ी भारतीय संविधान की सहमति- प्राप्त करने की कोशिशों पर केंद्रित है। जानिये कैसे भारतीय संविधान ने गैर-उदारवादी तत्वों को भी अपने उदारवादी दृष्टिकोण में जगह दी गई । आखिर संवैधानिक मामलों में समझौते इतने ज़रूरी क्यों हैं

रीडिंग लिंक – Tarunabh Khaitan : Directive Principles and the Expressive Accommodation of Ideological Dissenters

एपिसोड – 1 संविधान बनाने की प्रक्रिया एवं संविधान सभा

संविधान संवाद की पहली कड़ी संविधान बनाने की प्रक्रिया पर केंद्रित है।  एक संविधान पर आम सहमति पाना क्यों अत्यधिक मुश्किल है? क्या संविधान पर आम सहमति पाना उसकी सफलता से जुड़ा है? भारतीय संविधान के निर्माण के दौरान सहमति पाने के क्या तरीके अपनाए गए? इन सवालों को भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों पर हुई चर्चा के उदाहरण के ज़रिए समझिये।।

रीडिंग लिंक 1. Jon Elster Forces and mechanisms in the Constitutional making process.
रीडिंग लिंक 2. India’s Founding moment Madhav Khosla

उद्देशिका – तरुणाभ खेतान

भारतीय संविधान के उद्देशिका के अलग-अलग पहलुओं पर प्रोफेसर खेतान ने ‘द वायर’ पर प्रसारित इस सीरीज में विस्तार से बात की है। उद्देशिका में मूल तौर पर शामिल शब्द और बाद में भी जोड़े गए शब्दों पर प्रकाश डालते हुए उनके अर्थ को समझाने का प्रयास किया गया है। यह सीरीज द वायर के माध्यम से पहुंच रही है। तकनीकी सहयोग के लिए सत्य प्रसून का आभार।

उद्देशिका, एपिसोड – 5

उद्देशिका की व्याख्या की इस पाँचवी और आखिरी कड़ी में हम अपनी उद्देशिका की कुछ अन्य ख़ास बातों पर ध्यान देंगे और संविधानवाद के मायने भी समझने की कोशिश करेंगे। उद्देशिका के आखिरी शब्दों पर हम गौर करें तो वह कहती है कि इसके सभी उद्देश्यों को हासिल करने के लिए भारत के लोगों ने ढृंढ संकल्प लेकर संविधान सभा में तारीख़ 26 नवंबर 1950 को संविधान को “अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित” किया। कुछ लोगों का मानना है कि संविधान ने अंग्रेजी हुक़ूमत की अपेक्षा कुछ ज़्यादा फेर-बदल नहीं किया था। संविधान संवाद की कड़ियों में हम समझेंगे की क्या यह धारणा गलत है ? पर उद्देशिका की इस आखिरी कड़ी में देखिए की कैसे हमारे संविधान के निर्माता एक स्वाधीन देश में इसके आत्मार्पण की ज़रुरत को पूरी तरह समझते थे।

उद्देशिका, एपिसोड – 4

इस व्याख्या की चौथी कड़ी में हम उद्देशिका के अगले हिस्से पर ध्यान देंगे। इस कड़ी में उद्देशिका के अनुसार भारत के लोगों का संविधान को अपनाने में एक उद्देश्य यह भी था कि वे भारत के “समस्त नागरिकों में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता” बढ़ाने के लिए इस को संविधान अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित कर रहे हैं। इस कड़ी में बंधुता और प्रतिष्ठा की समानता पर भी चर्चा की गयी है ।

उद्देशिका, एपिसोड – 3

हमारी उद्देशिका की व्याख्या की इस तीसरी कड़ी में हम समझेंगे कि हमारा संविधान भारत के नागरिकों को क्या आश्वासन देता है? उद्देशिका के अनुसार हमारा संविधान भारत के समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समानता सुनिश्चित करता है। इस कड़ी में हम इन शब्दों की व्याख्या को समझेंगे।

उद्देशिका, एपिसोड – 2

संविधान की उद्देशिका की व्याख्या की इस दूसरी कड़ी में हम समझेंगे की संविधान क्यों भारत को एक “संपूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य” बनाने का प्रण लेता है। 1976 में संविधान के 42 वें संशोधन के द्वारा संविधान में शामिल किये गए शब्द ‘समाजवादी’ और ‘पंथनिर्पेक्ष’ पर खासा विवाद रहा है। हम इस पर भी गौर करेंगे।

उद्देशिका, एपिसोड – 1

संविधान की उद्देशिका के पहले चार शब्द हैं: “हम भारत के लोग”| हमारा संविधान भारत के लोगों ने किस तरह बनाया? उनके सामने कैसी चुनौतियाँ थीं? 1940 के दशक के दूसरे भाग में, जब संविधान सभा संविधान बनाने का काम कर रही थी, उस समय भारत और दुनिया में क्या परिस्थितियाँ  थीं? क्या यह संविधान वास्तव में ‘हम भारत के लोगों’ ने बनाया था?

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